चेहरे से किसी के जब नक़ाब उतरता है



ग़ज़ल     
सवालों पर न फिर कोई जवाब उतरता है
चेहरे से किसी के जब नक़ाब उतरता है

वो रखते हैं शान से इक म्यान में तलवारें कई
पहचान ले कोई तो रंग-ए-जनाब उतरता है

ऊँचे आसमान पर है ठिकाना आजकल
इतनी जल्दी कहाँ ऐसा रुआब उतरता है

नशे में चूर सनम कहाँ दिखेंगे हम तुम्हें
ग़ुरूर-ए-शोहरत है कहाँ, ये सराब उतरता है

किसी चाँद के डूब जाने की फिक्र क्या हो
जब आँगन में रोज़ नया माहताब उतरता है

पाक दामन रंगा है बे-रंगीनियों से किसी की
पन्नों पर कलम से नशा-ए-शराब उतरता है

बटोर दुआएँ न बन जाना किसी की बद्दुआ
'महक' लफ़्ज़ों में दर्द फिर लाजवाब उतरता है

- महक
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News Digital India 18

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