एक जानलेवा लत


अच्छा एक बात बताओ किस बात का गुस्सा है तुम्हें, रमा थोड़ी परेशान होती हुई बोली. पर अनुपम चुप. तुम्हारा यह चुप्पी साधना ही मुझे तकलीफ़ देता है बोलोगे हुआ क्या है. दो तीन बार मिन्नते कर के रमा गुस्से में पाँव पटकती फ़ोन को फेंकती हुई दूसरे कामों में लग गई.
- सुरेखा अग्रवाल     

यह आए दिन का नाटक था. रोज दोनो फ़ोन पर लड़ते, बेवजह ही था सब कुछ. हमेशा एक नया बहाना और एक नई कहानी उलझा कर रख दिया था उसने. यकीन करती थी, पर रोज एक नया किस्सा. मानो दुनियाँ की सारी मुसीबतें अनुपम के ही खाते ईश्वर ने दे रखी थी. बेशक किसी भी रिश्ते में अहम या स्वाभिमान आड़े नहीं आना चाहिए, पर एक तरफ़ा मनुहार और इंतज़ार कब तक?

अच्छे रिश्ते शायद इन्ही वजह से खत्म हो जाते हैं. रमा थक चुकी थी रोज एक नई कहानी सुन. वह अनुपम को जितना समझने की कोशिश करती, अनुपम अपनी बातों से उतना ही complicated होता जा रहा था. रमा एक स्त्री थी. वह उतनी ही मर्यादा लांघ सकती थी, जो समाज और परिवार के तरफ से हर स्त्री को होती थी. एक अनजान रिश्ते की तरफ बढ़ना आज उसे अपनी गलती लग रही थी.

और अनुपम? उसे रत्ती भर अहसास नहीं था. इंतज़ार, मनुहार और अनुपम का बढ़ता अज़ीब सा व्यवहार, रमा को परेशान कर रहा था. फिर भी एक प्यारे से रिश्ते को बचाने अपने स्वभिमान को ताक पर रख उसे मनाने की ही कोशिश करती.

आज नमस्कार के साथ संबोधन को बदल अनुपम ने न जाने कौन सा इशारा किया था. शायद रमा की जगह कोई और उसकी जिंदगी में शामिल हो गया था.

एक तजुर्बेकार मन यह भांप गया था. चले कोई ताउम्र...कोई सिर्फ दो कदम...! कहाँ हैं मंज़िलों की हद... सफ़र-सफ़र की बात है.

काम समेट एक कप coffee हाथ में ले अभी भी वह अपने फकीरे के बारे में सोच मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी. अगले के मन में क्या चल रहा, यह उसे नहीं मालूम था. पर अब मुझे छोड़कर कभी नहीं जाना, उसका कहना, उसे अब भी याद था.

coffee हाथों में थामे अब वह अपने स्वाभिमान को परे कर फेंके हुए फ़ोन को ढूँढने में लग गई. कहते हैं लत जल्दी छूटती नहीं औऱ बुरी लत तो सवाल ही नहीं उठता. अनुपम उसकी आदत ही नहीं एक बुरी लत थी. एक जानलेवा लत.

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