शिक्षा संस्थानों के आगे घुटने टेकना छोड़ें, हमारी मजबूरी वहां पढऩा है, तो उनकी भी मजबूरी हमें पढ़ाना है

मुद्दा / शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता

आज हालत यह है कि 80 फीसदी से अधिक प्राइवेट शिक्षण संस्थान सपना दिखाते हैं और लोग लालच में पड़कर लोन लेकर वहां प्रवेश ले लेते हैं। जब अंदर जाते हैं तब पता चलता है कि न तो काबिल शिक्षक है और न ही पढऩे की सारी व्यवस्था। इसके लिए उस नई पीढ़ी को ही आगे आना होगा, जो आज जुमलों और भ्रमित करने वाले नारों और अभियानों का हिस्सा बन रही है या बनाई जा रही है। जिसे छद्म धर्मांधता के नशे में डुबोकर सही राह से भटकाया जा रहा है। जिसे असल मुद्दों पर चर्चा करने लायक ही नहीं छोड़ा जा रहा है। 



संजय सक्सेना 

देश में लगातार शैक्षणिक संस्थान खुलते जा रहे हैं। महंगी फीस लेकर बच्चों को डाक्टर-इंजीनियर बना रहे हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता को लेकर कोई चर्चा आज भी नहीं हो रही है। स्कूल से लेकर कालेज तक फीस बहुत बड़ा मुद्दा है और यह देश में बढ़ते भ्रष्टाचार का भी एक कारण है, लेकिन इस पर कोई ठोस अभियान नहीं चलाया जा रहा है। 

भारत में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज करोड़ों की फीस लेकर मेडिकल छात्रों को गुलाम से भी बदतर बना रहे हैं। वे मजबूर हो रहे हैं कि दवा कंपनियों की गुलामी करें, अन्यथा एमडी की पढ़ाई की फीस नहीं दे पाएंगे। यही हाल इंजीनियरिंग का भी है। हमारे देश में 20-30 साल हो गए प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों के। इनकी गुणवत्ता पर बहस तो होनी ही चाहिए। आज स्थिति यह बन गई है कि हज़ार के करीब इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो गए हैं। जो प्राइवेट चल रहे हैं उनमें बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जा रही हैं। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में इंजीनियरिंग कालेजों में हर साल हजारों सीटें खाली रह जाती हैं, उन्हें धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। कई कालेज बंद भी हो रहे हैं। 

पिछले साल अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद(एआईसीटीई) से इंजीनियरिंग कॉलेजों ने 1 लाख 30 हज़ार से अधिक सीटों को बंद करने की अनुमति मांगी थी। इस बार भी ऐसी खबर है कि 494 कालेजों ने अपने कोर्स बंद कर देने की अनुमति मांगी है। इन खराब इंजीनियरिंग कॉलेजों में कितने छात्रों ने लोन लेकर एडमिशन लिया, लेकिन उन्हें नौकरी के नाम पर कुछ नहीं मिला। बेरोजगार इंजीनियर सड़कों पर भटक रहे हैं, मजदूरी कर रहे हैं। आत्महत्या तक करने को विवश हैं। 

प्रश्न यह उठता है, क्या यही शिक्षा हमारे युवा उससे आधी कीमत पर हासिल नहीं कर सकते थे? देखा जाए तो यह आम चुनाव मुद्दों के मामले में तो बर्बाद हो चुका है पिछले हर चुनावों की तरह। मगर देखिए कि गांव कस्बों में कॉलेजों को बर्बाद कर क्या लाभ मिला है? शिक्षा का बजट बढ़ा है। सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। उन्हें घाटे का सौदा बताया जा रहा है और निजी स्कूलों की बाढ़ आ रही है। ये कहीं घाटे में नहीं जा रहे। लोगों को खुले तौर पर लूट रहे हैं, जैसे हर सरकार ने इन्हें लूटने का लाइसेंस दे दिया है। इसके बाद भी गुणवत्ता पर आप सवाल नहीं उठा सकते। मनमानी फीस के खिलाफ नकली आंदोलन चलाए जा रहे हैं और प्रशासन व सरकार आश्वासन दे रही है। दिखावा कर रही है, जैसे वह छात्रों और पालकों के अधिकारों को संरक्षण दे ही रही है। 

तमाम मीडिया घरानों के अपने प्राइवेट स्कूल और कॉलेज खुल गए हैं। नेताओं का पैसा स्कूलों में लगा है। प्राइवेट शिक्षा उनकी दौलत को दुगनी तिगुनी करने में लगी है, सो मीडिया से भी बहुत उम्मीद नहीं रखी जा सकती। जिनके स्कूल नहीं खुले हैं, उन्हें विज्ञापन देकर मुंह बंद करने का प्रयास किया जाता है।

आज हालत यह है कि 80 फीसदी से अधिक प्राइवेट शिक्षण संस्थान सपना दिखाते हैं और लोग लालच में पड़कर लोन लेकर वहां प्रवेश ले लेते हैं। जब अंदर जाते हैं तब पता चलता है कि न तो काबिल शिक्षक है और न ही पढऩे की सारी व्यवस्था। इसके लिए उस नई पीढ़ी को ही आगे आना होगा, जो आज जुमलों और भ्रमित करने वाले नारों और अभियानों का हिस्सा बन रही है या बनाई जा रही है। जिसे छद्म धर्मांधता के नशे में डुबोकर सही राह से भटकाया जा रहा है। जिसे असल मुद्दों पर चर्चा करने लायक ही नहीं छोड़ा जा रहा है। 

कहां हैं वो युवा, जो गुणवत्ता वाली शिक्षा की बात कर रहे हैं? कौन उठा रहा है कि दुनिया के दो सौ सर्वोत्तम शिक्षण संस्थानों में भारत का एक भी संस्थान क्यों नहीं है? कौन सा अभियान चल रहा है सस्ती और गुणवत्ता वाली शिक्षा के लिए? कौन कह रहा है कि सरकार बेहतर शिक्षण संस्थान खड़े करे, जिसमें शिक्षा दिलाने के लिए लोगों को लोन न लेना पड़े, भ्रष्टाचार न करना पड़े? अब भी मौका है। जागने का। आगे आने का। नई बहस शुरू करने का। शिक्षण संस्थानों के साथ ही नेताओं का भी मूल्यांकन करें। शिक्षा की गुणवत्ता के साथ ही फीस पर भी हमारा ध्यान हो। हम संस्थानों के आगे घुटने टेकना छोड़ें। हमारी मजबूरी वहां पढऩा है, तो उनकी भी मजबूरी हमें पढ़ाना है। कोई पढऩे नहीं जाएगा, तो संस्थान बंद ही हो जाएगा। कुछ ठोस तो करना ही पड़ेगा। 

चूंकि अभी चुनाव चल रहा है, इसलिए आज राजनीति की बात भी करना लाजिमी है। मुद्दा तो बनाना पड़ेगा। आज नहीं कल। नहीं तो राजनेता खोखले एजेंडों, संकल्प पत्रों, वचन पत्रों में उलझाकर युवाओं को वोट बैंक बनाने तक सिमटा देंगे और हम असल मुद्दों से भटक कर उनके गुलाम बन कर रह जाएंगे।

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