स्त्रियों के व्रत, और उनके कमाल



''बाँध लेती हैं स्त्रियाँ सभी मुरादें व्रत के धागों में और लपेट आती हैं कहीं पीपल के इर्द गिर्द. ले आती हैं साथ एक विश्वास कि फेंक आई हैं सारी पनौतियाँ गहरे कुएं में. ''
- महक        
सुनने में ही कितना पवित्र लगता है न, व्रत. आईना है समाज का. "व्रत" कुलीनता सहेजते हैं समाज में. व्रत अद्भुत परंपरा के परिचायक हैं. बाँध लेती हैं स्त्रियाँ सभी मुरादें व्रत के धागों में और लपेट आती हैं कहीं पीपल के इर्द गिर्द. ले आती हैं साथ एक विश्वास कि फेंक आई हैं सारी पनौतियाँ गहरे कुएं में. उतार लाती हैं चाँद को हथेली पर कि खींच के उम्र बढ़ा लेंगी माँग के सिंदूर की. और खनखाती रहेंगी पायल ताउम्र आँगन में. 

वे समेट लेती हैं अपने व्रत से सारे सितारे आसमाँ के अपने आँचल में कि खिलखिलाते रहें नन्हें फूल उसकी बगिया के. सुबह सवेरे की शँख ध्वनि से शुरू होकर शाम की तुलसी की आराधना तक कान्हा जी के स्नान से संध्या वंदन तक हर व्रत हर पूजा को धूप दीप से सुगंधित कर समाज में अपनी संस्कृति का विकास करती स्त्रियाँ. समेट लेती हैं जीवन की सारी खुशी अपने हर एक व्रत में...

पाप का नाश करते, पुण्य का उदय करते, ये व्रत मिट्टी की इस देह और अशांत, अशुद्ध मन को शांत और शुद्ध करते हैं. समाज को धर्म से जोड़ते हैं. आपसी स्नेह और सौहाद्र से वातावरण को सुगंधित करते हैं. जिस उत्साह और परिश्रम से स्त्रियाँ देश में इस संस्कृति को निभाने के अथक प्रयास करती हैं, उससे कहीं अधिक भाव से विदेशों में स्त्रियाँ इन व्रतों का पालन कर अपनी संस्कृति को गौरवशाली बनाकर संसार भर में अपने व्रत का महत्व बढ़ाती हैं.

इन्हीं व्रत के फलस्वरूप स्त्रियाँ अपने घर को पावन बनाती हैं. प्रेम और आस्था की खाद पुराने बरगद से लेकर नए पौधों को रोपती हैं. इन्हीं व्रत के फलस्वरूप अपनी सारी दुविधाओं को लाल धागे में बाँध कर मंदिर में ईश मूरत के समक्ष रख बेफिक्र सी लाँघ जाती हैं रूह के उदय से अस्त होने का सफ़र...!


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News Digital India 18

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