मुश्किल सीट पर कमाल दिखाने जा रहे हैं दिग्गीराजा?



प्रारम्भ में लगा था दिग्गी राजा आखिर फंस ही गए, लेकिन नहीं अपनों ने फंसाया था, गैरों ने नबाजा है, मजाक, मजाक में भोपाल से लड़ बैठे राधौगढ़ के राजा 'दिग्विजय की जीत होगी' की चर्चाएँ अब आम हो गई हैं. भोपाल से उम्मीदवारी के साथ ही भोपाल में सक्रिय रहकर दिग्विजय फील्डिंग जमा रहे हैं, उधर बीजेपी ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं. चर्चा यह भी है कि बीजेपी उन्हें डमी केंडीडेट देने जा रही है. 



डॉ. अरविन्द जैन

कई कारणों से विवादित व्यक्तित्व के धनी दिग्विजय सिंह के पास उन दिनों कांग्रेस में कोई काम नहीं था. लिहाजा उन्होंने धार्मिक पुण्य कमाने की गरज से नर्मदा परिक्रमा लगाने की ठान ली. 71 साल की उम्र में 3700 किलो मीटर की लंबी नर्मदा परिक्रमा से उन्होंने पुण्य तो कमाया ही, साथ-साथ अपने राजनीतिक कॅरियर को भी चमकाया. चर्चा है कि मुश्किल सीट से उन्हें लड़ने में कमलनाथ का रोल था, लेकिन यह सीट भी अब उन्हें मुश्किल नहीं रह गई है. जैसा कहा जाता है कि शायर, शेर, सपूत हमेशा लीक से हटकर चलते हैं. उनके विचारों को समझना बहुत कठिन होता है. ऐसे ही माने जाते हैं चतुर राजनैतिक नेता दिग्विजय. मजाक, मजाक में भोपाल से लड़ बैठे राधौगढ़ के राजा 'दिग्विजय की जीत होगी' की चर्चाएँ अब आम हो गई हैं. 

लगभग 50 साल बाद यानी 72 साल की उम्र में दिग्विजय एक बार फिर चुनावी समर में हैं. यह समर है भोपाल संसदीय सीट का, जो उनके अब तक के सभी चुनावों के मुकाबले सबसे कठिन साबित हो सकता है. नया क्षेत्र, नया मतदाता, नए किस्म का सियासी मिजाज. पिछले तीन दशक से भाजपा को मिल रही लगातार जीत ने कांग्रेस की सूची में भोपाल का नाम लाल अक्षरों में डेंजर जोन वाली सीटों में दर्ज करा दिया है.


दिग्विजय सिंह जैसे बड़े कद के नेता को भोपाल से उतारने का मकसद सूची में भोपाल को डेंजर जोन से सेफ जोन में लाना है. कार्यकर्ताओं में उत्साह भरते सिंह टिकट मिलने के बाद से कह रहे हैं कि भाजपा चाहे जिसे टिकट दे दे, उनकी जीत तय है. गौरतलब है कि सिंह के नाम के एलान होने के दस दिन बाद तक भाजपा उनके मुकाबले उम्मीदवार का नाम तय नहीं कर पायी. उनके समर्थक इसे दिग्विजय का खौफ बताते हैं.

आदिवासी समाज के होली मिलन में दिग्विजय खूब थिरके 
लोकसभा क्षेत्र भोपाल के ग्राम भानपुर केकड़िया हुजूर में होली के अवसर पर  
आदिवासी समाज के होली मिलन एवं गणगौर कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह ग्रामीणों के साथ खूब थिरके, साथ में पर्यटन मंत्री सुरेंद्र सिंह(हनी) बघेल भी. देखें VIDEO- 




सोचा जा सकता है कि जिस सीट से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा जैसे शख्स कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीते हों, वहां कांग्रेस तीस साल से एक जीत के लिए तरस रही है. कांग्रेस ने यहां सारे नुस्खे आजमा लिए. ब्राह्मण, मुस्लिम, कायस्थ, ओबीसी, नवाब, क्रिकेटर, स्थानीय, बाहरी सबको आजमा लिया, पर कामयाबी नसीब नहीं हो पायी. कांग्रेस के केएन प्रधान 1984 में भोपाल से जीतने वाले आखिरी उम्मीदवार थे. हारने वालों की सूची में पूर्व क्रिकेटर नवाब पटौदी, पूर्व मन्त्री सुरेश पचौरी जैसे दिग्गज शामिल हैं.

सूत्रों की मानें तो मुख्यमन्त्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच काफी पहले तय हो गया था कि सिंह भोपाल से चुनाव लड़ेंगे. कमल नाथ ने उन्हें भोपाल जैसी कठिन सीट से चुनाव मैदान में उतरने की सलाह दी और एक रणनीति के तहत चुनाव समिति की मुहर लगने से पहले मीडिया के सामने उनका नाम भोपाल सीट से घोषित कर दिया.


दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा
कांग्रेस में उनके पास कोई काम नहीं था. लिहाजा उन्होंने धार्मिक पुण्य कमाने की गरज से नर्मदा परिक्रमा लगाने की ठान ली. 71 साल की उम्र में 3700 किमी लंबी नर्मदा परिक्रमा से उन्होंने पुण्य तो कमाया ही, साथ-साथ अपने राजनीतिक कॅरियर को भी चमकाया. किस्मत और मेहरबान हुई और उनके हमदर्द कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनकर भोपाल आ गए. इसके बाद सिंह किंगमेकर की भूमिका में कमलनाथ को मुख्यमन्त्री बनाने में जुट गए. तब से अब तक दिग्विजय मध्यप्रदेश की सियासत में अहम रोल निभा रहे हैं.

भोपाल में मतदाताओं की संख्या करीब 16 लाख है. एक अनुमान के मुताबिक इनमें मुस्लिम मतदाताओं की तादाद साढ़े तीन लाख के आस-पास है. आठ विधानसभाओं में से दो सीटें मुस्लिम बहुल हैं. 30 साल तक भोपाल सीट पर भाजपा के काबिज रहने की एक वजह वोटों का ध्रुवीकरण भी है. इस ध्रुवीकरण को इस बार भी दिग्विजय सिंह के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, इसमें किसी को शक नहीं है. कांग्रेस का गणित यह है कि दिग्विजय को आठ में से चार सीटों पर निर्णायक बढ़त मिलेगी और वे चुनाव निकाल ले जाएंगे. ये सीटें हैं भोपाल उत्तर, भोपाल मध्य, बैरसिया और सीहोर. दक्षिण पश्चिम सीट पर मामला बराबरी का हो सकता है जबकि गोविंदपुरा, हुजूर और नरेला में भाजपा को बढ़त मिल सकती है. विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच लगभग 67 हजार वोटों का फासला था. दिग्विजय इस फासले को किस तरह पाटते हैं यह देखना दिलचस्प होगा.


देश में हजारों नेता हैं जिनको संभव है कि उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक सारे लोग नहीं जानते हों, लेकिन दिग्विजय सिंह सोशल मीडिया में अपनी विवादित मौजूदगी के चलते पूरे देश में जाने जाते हैं. चुनावी रंग के शबाब पर आने में वक्त लगेगा, लेकिन हिन्दूत्व का कार्ड मैदान पकड़ने लगा है. उनके समर्थक मन्त्री आरिफ अकील ने दिग्विजय सिंह को सबसे बड़ा हिन्दूवादी चेहरा बताकर इस मुहिम को सबसे पहले हवा दी. खुद दिग्विजय ने अपने नाम का एलान होने के बाद सबसे पहला काम किया अपने गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और जैन संत आचार्य विद्यासागर से आशीर्वाद लेने का. इसके बाद उन्होंने भोपाल पहुँचकर मंदिरों में मत्था टेका.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर सिंह शुरू से हमलावर रहे है. पिछले  हफ्ते उन्होंने कहा कि संघ स्वयं को हिन्दू हितैषी सांस्कृतिक संगठन बताता है. मैं हिन्दू हूं तो मुझसे बैर क्यों? राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेगा वैसे-वैसे हिन्दूत्व का मुद्दा जोर पकड़ेगा.

दिग्विजय के चुनाव मैदान में उतरते ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय हो गया है. संघ के दिग्गज भैयाजी जोशी पिछले मंगलवार को भोपाल में थे. उन्होंने भाजपा और संघ के पदाधिकारियों से कहा है कि भोपाल सीट को गंभीरता से लें. यही वजह है कि उम्मीदवार चयन को लेकर भी भाजपा जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गयी है.  

लेखक उपन्यासकार होकर शाकाहार परिषद्, भोपाल  के संरक्षक हैं.

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