भिखारी


फटा पुराना लत्ता पहने
चेहरे पे झुरियाँ छुपाये
आगे को मुँह लटकाये
हाथ में कटोरा पकड़े
काँख में पोटरी दबाये
माथे पर बदकिस्मत की लकीर लिखाये
उल्ट पुल्टे टूटा फूटा चप्पल पहने
बेहताशा सड़क पर
तो कभी गली कूचों में 
मारे मारे फिरते
दिखने में साधु लगता
पर है भिखारी....!

उपदेश नहीं आशीर्वाद देता
बदले में बस थोड़ा भीख 
दरवाजे दरवाजे शोर लगा
यही बार बार कहता
"दे दाता के नाम तुझको अल्ला रख्खे"
लोग कान में जैसे रूई रख लेते
रोज बेटा बेटी की बिमारी का बहाना सुन
तो कभी बेटी की शादी का खर्चा मांगते
तो कभी अपने की मौत का मातम मनाते
ऐसे हरकतों से लोग ऊकता चुके थे!

क्योंकि अच्छे भले लोग
जिसको कमी नहीं किसी चीज की
वो भी पैसे के लालच में 
काम से जी हैं चुराते 
वही मार देते हैं 
असली भिखारी के पेट पर लात!

धर्म कहता "पाप कटाओ, गंगा नहाओ"
दान पुण्य साधु,भिखारी को करो
सरकार कहती "भीख देना पाप है"
निकम्मों लोगों को इससे बढ़ावा मिलता
इससे बेरोजगारी है बढ़ती
जनसंख्या भी है बढ़ती
विकास कार्य में धन खर्च बढ़ता
अर्थव्यवस्था पड़ती सुस्त 
दुनिया में भारत की छवि होती धूमिल!

देश में घोटालों की फेरिस्त है लम्बी
मंत्रियों के स्विस बैंक में खाते भरे
कालाबाजारी करने वालों के घर भरे
बाहर भूखे नंगे दाने को तरसते
बेइमानों के रजाई में नोट भरे
गरीबों के बिस्तर में है रूई कम
फिर भी सरकार को क्यों दिखता कम?
विकास के नाम पर पैसे आते
मिल बाँटकर प्रशासक भतीजे और
नेता मामा खा जाते!

देना है तो कोई रोजगार हमें भी दे दो
जैसे भले चंगों और दिव्यागों को मिलता 
फिर ना मांगेगे हम भिखारी
कभी भीख आपसे हो माई बाप!

- कुमारी अर्चना "बिट्टू"   

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