आस्तित्व


लघु कथा                   


''अरे यह क्या करुणा, यह नाश्ता इतना heavy किस जमाने में जी रही हो तुम, अमा यार कब तक पुराने जमाने में जियोगी और इतना घी परांठे में?? कितनी बार कहा है ''
- सुरेखा अग्रवाल लखनऊ 

माँ तुम भी ना कोई भी चीज कहीं रख देती हो, रिनोवेटेड मकान को देखते हुए अवि माँ पर खीज रहा था. यह देखो फ्रिज पर और यह पुरानी ट्रॉफी अपने जमाने की यहाँ क्यों रखी?? बड़ा बेटा अवि हर कमरे में जाकर सिर्फ खीज रहा था, जो कि सुबह ही इटली से लौटा था..!

इतने में छोटा बेटा अपने कमरे से चिलाया माआअआ, हड़बड़ाती करुणा छोटे बेटे विनि के कमरे में, मेरा स्पीकर यहाँ से क्यों हटाया माँ और यह क्या मेरी किताबें, आपने सही की क्यों?? और उस क्यों? का जवाब करुणा के पास नहीं था..

इतने में मिहिर कमरे से आवाज देते हैं करुणा नाश्ता?? करुणा मेरा रुमाल ना जाने कहाँ रख देती हो सब, उलझी करुणा dinning पर बैठने का इशारा दे रसोई में भागती है, सब्जी दही और पनीर के परांठे दिन भर ऑफिस और कॉलेज स्कूल तीनों को ध्यान में रखते हुए एक ममता से भरपूर नाश्ता..

अरे यह क्या करुणा, यह नाश्ता इतना heavy किस जमाने में जी रही हो तुम, अमा यार कब तक पुराने जमाने में जियोगी और इतना घी परांठे में?? कितनी बार कहा है खाना ढंग का बनाया करो और ना जाने क्या क्या..! जूस सैंडविच रखा करो और अपनी पापा की सहमति से दोनों बेटे उस सहमति से नाश्ते का उपहास, उड़ा रहे थे और अट्ठहास करता वजूद करुणा के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा था... और लगभग यह रोज का ही था..!

रोज नए पाठ पढ़ाए जाते. रोज एक नई गलती ढूंढी जाती. किसी ना किसी बात पर रोज एक प्रहार. प्रतिक्रिया नहीं देती थी, हाँ आँखें अब जरूर साथ नहीं देती थीं. सोचती क्या है उसका अपना यहाँ कोई निर्णय नहीं, ऊँची आवाज़ में अपना पक्ष भी नहीं रख सकती थी वह, नम आँखों से. 

तीनों के जाने के बाद करुणा यही सोच रही थी, एक कप चाय के साथ मानो उसका अस्तित्व भी इस चाय की तरह होता जा रहा है, तलब लगे तो गर्म और ठण्डी हुई तो तासिर खत्म. खुद का अस्तित्व ढूंढती करुणा पुनः एक प्रश्न के साथ अपने कामों में और तानों बानों में गुम अन्तस् को आंसुओं की नम श्रद्धांजलि के हवाले कर अपना वजूद ढूँढने में लग गई, जो शायद इसी जिम्मेदारियों में कहीं खो गया था...

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News Digital India 18

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