अमीर होने के लिए खूब पैसा हो, यही जरूरी नहीं है, बिना पैसे के भी कर सकते हैं इस तांगे में सवारी


साहेब लाल जी की नई सवारी    



अमीर होने के लिए खूब पैसा हो यही जरूरी नहीं है, अब इस तांगे वाले को ही देख लीजिये. दुलार जी तो कहते हैं कि कई बार तो मुझे मुफ्त में लोगों को चढ़ाना पड़ता है, क्योंकि वो पैसे न होने की वजह से पैदल चल रहे होते हैं और सोनू उसे बैठाने की जिद पर अड़ा होता है. अंततः दुलार जी को कहना पड़ता है कि हम पैसा न लेंगे बाकी आप बैठ जाइए.



साहेब लाल     

मैं बन्दा बिंदास रहने वाला एक छोटी सी सड़क दुर्घटना के बाद से घर परिवार का हुकूमत का शिकार हो गया हूँ. 

कहाँ तो 200 किलोमीटर तक कि दूरी को मोटरसायकल से ही नाप देता था, जो अब स्वस्थ हो जाने के बाद 60 किलोमीटर की दूरी (घर से स्कूल) पर मोटरसायकल से जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ट्रेन का मंथली पास बनवा दिया गया है और स्टेशन से स्कूल तक की 25 किलोमीटर की दूरी को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है. 

घर से आधी राह तक तो कुछ आसानी से पहुंच जाता हूँ, पर आगे का सफर बड़ा कष्टकर है. लोकल बस की भीड़ भरी सवारी वो भी आधी राह तक. पुनः आगे के सफर के लिए ऑटो भरने का इंतजार करना पड़ता है, जो सुदूर ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण एक बोझिल सा काम है. कभी कभी तो ऊब कर सात-आठ किलोमीटर का सफर पैदल ही चल देता हूँ.  

ऐसे ही एक रोज पैदल की सवारी में एक ताँगा वाला को गुजरते देखा. घोड़ा अड़ गया था. उसका चालक बच्चे की भाँति उससे बात कर बहला रहा था. पर वो चलने का नाम न ले रहा था. तब तक मैं तांगे के करीब पहुँच चुका था. तांगे वाला को अनुमान था कि मैं आस पास ही जा रहा हूँ, इसलिए मुझे कोई सवारी नहीं चाहिए. फिर भी मुझसे रोक कर तांगे पर बैठने का अनुरोध करता है. मेरे लिए तो ये मरुस्थल में छांव की तरह था. मैं बैठ गया. अब घोड़ा चल पड़ा. साथ ही हमारी बात-चीत भी.

तांगे वाले मालिक का शुभ नाम है "दुलार" और उनके घोड़े का नाम बच्चे के जैसा "सोनू" . 

मुझे दोनों का नाम बहुत अच्छा लगा. जब बात- चीत का क्रम आगे बढ़ा तो सोनू ने तो मेरा दिल ही जीत लिया. 

दुलार जी पास के ही गांव के निवासी हैं. एक बेटा के असमय चले जाने के कारण दुलार जी समय से पहले बुढ़ापे की सफर पर चल पड़े हैं. घर गृहस्थी की गाड़ी चलती रही, इसलिए तांगे के रोजगार में मन लगाना पड़ा. सोनू(घोड़ा) को बच्चे सा प्यार करते हैं. सोनू भी न केवल दुलार जी की हर बात समझता है, बल्कि कभी कभी बच्चे की तरह हठ भी करता है.

दुलार जी का मुख्य काम है अपने गांव से मुख्य बाजार के बीच पड़ने वाले चार-पांच गांव के दुकानदारों का सामान बाजार से लाकर उनके घर तक पहुंचाना.

मतलब गांव का दुकानदार अपनी जरूरत की समान की पर्ची दुलार जी को देता है और दुलार जी सभी का सामान खरीद तांगे पर लाद उनके घर तक पहुंचा देते हैं. बदले में कुछ पैसे मिल जाता है.

ये तो उनका रोजगार हुआ हुआ, पर आकर्षण का केंद्र तो यहाँ सोनू है, जिसे हर दुकानदार के घर का पता मालूम है. वो अपने मन से अपनी राह चलता है. कोई दुकानदार सामान मंगवाया है और पैसा न दिया है तो वो खुद उस दुकानदार की घर की ओर कदम बढ़ाता है. मतलब कहाँ-कहाँ तगादा करना है, कहाँ से ऑर्डर लेना है, सब भली- भांति समझता है. 

कभी कभी तो दुलार जी को कहना पड़ता है कि, "अरे आज उनको समान न मंगाना है. पर वो अड़ जाता है. आखिर कहना पड़ता है,
"चल तू अपने देख ले." 

सोनू है तो पशु पर उसमें कुछ मानवीय गुणों का समावेश है, जो शायद दुलार जी स्नेह की उपज है . 

रास्ते में यदि कोई राह चलता व्यक्ति दिख जाता है तो सोनू रुक जाता है. ये सन्देश है कि उसे गाड़ी पर बिठाओ. 

अब दुलार जी असमंजस में रहते हैं कि क्या पता अगला चढ़ना चाहे या न. या उसके पास पैसा है या नहीं, पर सोनू को इससे कोई मतलब नहीं. बस कोई पैदल चल रहा है तो उसे बिठाओ.
मुझे भी देख कर सोनू इसलिए अड़ा था, जबकि दुलार जी का अनुमान था कि मुझे तांगे की जरूरत न है. इसलिए वो सोनू को समझा रहे थे कि, "अरे उ न जैइथीन".

पर सोनू कहाँ मानने वाला वो तो बस गर्दन झटक कर कहना चाह रहा था एक बार पूछ कर तो देखते.

दुलार जी के साथ सोनू की चर्चा में कब सफर कटा पता भी न चला. पर सोनू के प्रति मेरा भी स्नेह बढ़ गया.

दुलार जी तो कहते हैं कि कई बार तो मुझे मुफ्त में लोगों को चढ़ाना पड़ता है, क्योंकि वो पैसे न होने की वजह से पैदल चल रहे होते हैं और सोनू उसे बैठाने की जिद पर अड़ा होता है.अंततः दुलार जी को कहना पड़ता है कि हम पैसा न लेंगे बाकी आप बैठ जाइए.

अब तो सोनू के साथ लगभग हर रोज का सफर है मेरा.कभी न दिखा तो ऑटो भरने के इंतजार में सोनू व दुलार जी को याद करते रहते हैं.

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