जाने कहाँ तकती हैं इसकी आँखें


जाने कहाँ तकती हैं इसकी आँखें 
जिसके साथ समीप लेटा है देश का भविष्य
एक के तन पर आधा कपड़ा 
दुसरे पर तो वो भी नहीं 

भूखा तन है, भूखा मन है
लोकतंत्र का मतलब क्या जाने 
दो जून कि रोटी को तरसे 
बाकी जीवन में क्या जाने 

आँखें टंगी किसी कोने में 
शायद कोई वहां से आ जाए 
जिसके हाथ हो छड़ी जादू की 
जिससे सबको सुख दे जाये..

                    - सीमा राय द्विवेदी     



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