झलकती लौटती शाम का आह्लाद

समीक्षा : त्रैमासिक पत्रिका ''विश्वगाथा'' जनवरी-मार्च-2019

पाँचसाल पूरा करके छठे वर्ष में प्रवेश कर चुकी 'विश्व गाथा' ने आते ही मन मोह लिया। खूबसूरत मुखपृष्ठ पर समय के हस्ताक्षर जैसा बाँस के फूलों का चित्र जो हमारे भावनगर शहर निवासी श्रीमती देवयानी पंडित जी का है, इन से 'विश्व गाथा' का सौंदर्य खिल उठा है। पूर्णरूप से नए रूप को धरें 'विश्व गाथा' का बदला हुआ रूप पाठकों को भी मनोरम्य है।


भावनगर, गुजरात से

'विश्व गाथा' के मुखपृष्ठ को निखारती आ. दीप्ति नवल जी की सुंदर रचना बहुत कुछ कह जाती है। शब्दों से परे जो संवेदना है वो गहन मौन में ले गई। कविता बहुत जीवंत लगी।

आ. पंकज त्रिवेदी जी के संपादकीय लेख में भी झलकती लौटती शाम का आह्लाद और विगत एवम आगत को जोड़ता हुआ वर्तमान का स्वागत.. बहेतरीन..!  बार बार पढ़ने को जी चाहता है।


डॉ. शेफालिका वर्मा जी का उनकी ही बेटी डॉ. भावना नवीन के द्वारा अनुवादित लेख अद्भुत मानवीय संवेदनाओं को आकलित करता है, साहित्य का महिमागान करता आ. शोभा जैन का लेख भी हरेक साहित्यकारों के लिये तोहफ़े के समान लगा।

आज की समाजव्यवस्था और स्री की दुर्दशा पर प्रकाश डालता डॉ. रेणुका व्यास का लेख भी काफ़ी कुछ कह गया। आ. राजेन्द्र ओझा का लघु आलेख और आ. लिली मित्रा जी का लेख जीवन की वास्तविकता से रूबरू करवा गया।


आ. सावन कुमार की कहानी 'मरजाद' आज भी समाज में बनी हुई बदियाँ को सरेआम कर गई। अपनी जड़ों से दूर होती अपनी ही पीढ़ी को देखने का दर्द बहुत खूबी से दर्शाती आ. नृपेश शर्मा की कहानी भी दिलचस्प। बुढ़ापा और क़भी न थमने वाली इच्छाओं के मेले में सैर कराती आ. गोविंद सेन जी की कहानी भी बहुत कुछ कह गई। अलग अंदाज में लिखी गई डॉ. हंसा दीप की कहानी 'मधुमक्खी' भी मानवीय दोगलेपन का परिचय करा गई। एक ओर फ़र्ज औए दूसरी और प्यार को निभाती आ. जितेंद्र शिवहरे की कहानी 'देवर-भाभी' भी पठनीय ..आ. ललित बेरी की बाल कहानी भी नए तरीके से परोसी गई मिठाई सी लगी। प्रभा नेह गवांडे की लघुकथा 'महकते जज्बात' और आ. त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी की दोनों लघुकथाएँ भी सुंदर..! मल्लिका मुखर्जी का संस्मरण और व्यंग्य परोसता आ. वीरेंद्र सरल और मदन गुप्ता जी का लेख क़ाबिले तारीफ रहा।

पुस्तक समीक्षा में आ. प्रीति जैन अग्रवाल जी के काव्य संग्रह 'स्वप्न रंजीता' की समीक्षा करती आ. जितेन्द्र प्रसाद माथुर जी की कलम और आ. ऋचा फोगट जी के काव्य संग्रह 'हद से अनहद' की समीक्षा लेकर आई आ. सूरजमल रस्तोगी जी की कलम और आ. राजकुमार जैन के बाल कविता संग्रह 'पेड़ लगाओ' की आ. घनश्याम मैथिल की कलम से की गई समीक्षा, संकलित लघुकथा संग्रह कृति-आकृति की आ. दीपक गिरकर जी की समीक्षा 'विश्व गाथा' में तूलिका सी रंग भर गई।

पोलिश कवि हर्बर्ट की मोनिका कुमार द्वारा अनुवादित कविताएँ कुछ अलग अंदाज़ में निर्जीव वस्तुओं की जीवंतता बयाँ कर गई, तो पद्मा सिंह जी की रचना बसंत का स्वागत करती लगी। आ. ईशु नांगिया की 'क्षणिकाएँ' घट में समंदर सी लगी। आ. ध्रुव गुप्त की रचना हमेशा की तरह नायाब.. माँ का स्मरण और सरसौं के खेतों से अनुबंध ..गजब का एहसास पिरोया है..! आ. इंदिरा किसलय की प्रकृति सी हरियाली रचना 'कुहू ने कहा' बहुत ही सुंदर..! तो मुख्तार अहमद की रचना आज की भौतिकता पर तीर साधती हुई लगी। आ. सीमा विजय की दो गजलें और आ. गरिमा सक्सेना की दो कविताएँ भी रोचक। डॉ. उर्वशी भट्ट की जानदार कविताएँ भी पाठक को एक अलग ही सोच का दर्शन करायेंगी।

आ. सुबोध श्रीवास्तव जी के दोहे और नरेश केला जी की गजलें भी सुंदर..!
आ. नीतू झा की कविता की पंक्तियां दिल को छू गई ।


आखिर में मेरा पसंदीदा पन्ना आ. सुमंत रावल द्वारा लिखित और डॉ. राजेन्द्र निगम द्वारा अनुवादित ऑस्कर अवॉर्ड 'फ़िल्म टेन कमांडमेट्स' की सुनहरी सफर दिल को तरोताज़ा कर गई।

आ. पंकज त्रिवेदी जी द्वारा संपादित 'विश्व गाथा' के पन्नों पर मेरी एक बाल कहानी 'मोंटू की पाठशाला' और आ. सूरजमल रस्तोगी जी के कविता संग्रह 'बाँट लें आकाश' की मेरे द्वारा की गई समीक्षा को स्थान मिला है विश्वगाथा सफ़लता के नये शिखरों को हाँसिल करे ऐसी शुभकामनाएं..

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News Digital India 18

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3 comments:

  1. पत्रिका के संपूर्ण साहित्य संकलन सी सार्थक समीक्षा के लिए अशेष शुभकामनाएं।'विश्वगाथा'रचनात्मक उत्कर्ष को प्राप्त करे पत्रिका से जुड़े सभी साहित्य साधकों को साधुवाद।

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद

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