अपनों के संग ये कैसा रंग? सर्फ़ एक्सेल कपड़ों को नहीं, हिंदुओं को धो रहा और सरकार चुप




अपनों के संग ये कैसा रंग ? 
होली के पवित्र रंग को 'दाग' कहने वाले सर्फ एक्सेल को मुहर्रम के समय फैला खून नहीं दिखता? क्या उसे लेकर कोइ विज्ञापन करने का साहस सर्फ एक्सेल कभी करेगा?

त्योहारों पर विशेष विज्ञापन बनाने वाले सर्फ एक्सेल ने होली पर एक नया विज्ञापन लॉन्च किया है, जिसमें हिन्दुओं की पवित्र आस्थाओं को बड़ी चालाकी के साथ दूषित करने का प्रयास किया गया है. विज्ञापन का सोशल मीडिया पर जम कर विरोध किया जा रहा है. सर्फ एक्सेल का बहिष्कार करने की अपील के साथ कहा जा रहा है देश की गंगा जमुनी तहजीब, भाईचारे को बिगाड़ रहा है और सरकार चुप है.  



संजय गोविल

इस प्रकार की एक पोस्ट सोशल मीडिया पर जैम कर वायरल हो रही है. इसके अनुसार विज्ञापन एक साथ कई निशाने साध रहा है. 
विज्ञापन के अनुसार  
एक हिंदू बच्ची होली के दिन सायकल लेकर गली में निकलती है, जहाँ छतों पर बच्चे बाल्टियों में रँगों से भरकर बलून रखे हुए हैं. 
बच्ची पूछती है रँग फेंकना है फेंको. सभी बच्चे उस पर कलर बलून फेंकने लगते हैं. बच्ची गली में सायकल घुमा घुमाकर रंगों से सरोबार हो जाती है.
जब बच्ची पर रँग पड़ना बन्द हो जाते हैं, वो साइकिल रोककर छत पर खड़े बच्चों से पूछती है- हो गये रँग खत्म या औऱ हैं?
बच्चों के मना करते ही एक घर में से सफ़ेद झक कुर्ता पजामा पहने मुस्लिम बच्चा बाहर निकलता है, जिसे हिन्दू बच्ची अपने सायकल के पीछे बैठाकर मस्जिद छोड़ने जाती है. बच्चा कहता है-नमाज पढ़कर आता हूँ.
और उसी दौरान विज्ञापन में शबाना आजमी की आवाज सुनाई देती है-अपनो की मदद करने में दाग लगे तो "दाग" अच्छे हैं.


यहाँ विज्ञापन ने एक साथ कई निशाने साधे हैं        
पहला होली के पवित्र रँगों को "दाग" कहने की चेष्टा की गई. वह भी अन्य मज़हब के लिये. बच्ची द्वारा होली के रंगों में सरोबार होने में सर्फ एक्सेल को "दाग" नजर आते हैं. 
दूषित विज्ञापन से एक प्रकार से नमाज की पवित्रता औऱ आवश्यकता को होली के त्यौहार से अधिक महत्वपूर्ण बताने का चतुराई पूर्वक कुत्सित प्रयास किया गया है.

विज्ञापन का सोशल मीडिया पर जम कर विरोध किया जा रहा है. कहा जा रहा है अगर आपके मन में विज्ञापन देखकर एक बार भी गंगा जमुनी तहजीब, भाईचारे, बच्चों की मासूमियत का खयाल आता है तो आप बौध्दिक पिशाचों के पाश में जकड़ चुके हैं. 

विज्ञापन को दूसरा लव जिहाद बताया जा रहा है. कहा जा रहा है यहाँ जानबूझकर हिन्दू लड़की चुनी गई. हिन्दू लड़का भी चुना जा सकता था, लेकिन बचपन से मदद, मानवता के नाम पर हिन्दू बच्चियों और माँ बाप के अंदर लव जिहाद के बीज बो देना. यही बौद्धिक आतंकवाद है. बच्चों के नाम पर अपना नैरेटिव सैट करना, जिसमें खुद आप उनकी मदद करे.

यहाँ एक औऱ बात ध्यान देने योग्य है विज्ञापन के अंत में आवाज शबाना आजमी की है, जिनका एनजीओ धर्मांतरण औऱ हिन्दू विरोधी गतिविधियों के लिये कुख्यात है.

सर्फ़ एक्सेल से एक सवाल पूछिए     
क्या सर्फ एक्सेल मोहहरम पर ऐसा विज्ञापन बना सकता है?
जहाँ मुस्लिम बच्ची हिन्दू बच्चे को कुर्बानी के खून के छींटों से बचाते हुए, अपने कपड़ों पर लेते हुए, मन्दिर ले जाये आरती के लिये.
तब शबाना आजमी कहे अपनो की मदद के लिये दाग लगे तो दाग अच्छे हैं. 

या ईद पर जब चारों तरफ जानवर काटे जा रहे हों गलियों में खून बह रहा हो, तब कोई मुस्लिम लड़की उस खून में अपने पैर और कपड़े गंदे करते हुए किसी हिन्दू लड़के को मन्दिर में पूजा के लिए लेकर जाए.
और पीछे से शबाना आज़मी की मधुर आवाज आए- अपनों की मदद के लिए दाग लगें तो दाग अच्छे हैं.

या सिर्फ हिंदुओं ने ही अपने आपको इतना सस्ता कर लिया है कि मिलार्ड, केजरी, ममता, बुद्धिजीवी, कोंग्रेस, मीडिया, जेहादी, टुकड़े टुकड़े गैंग, वामपंथी, सेक्युलर कीड़े या जिसका भी दिल करे वही करो छेड़छाड़ इनकी परम्पराओं, धार्मिक मान्यताओं से, ये कुछ नहीं करेंगे, मरी हुई कौम है. 

विज्ञापन गंगा जमुनी तहजीब, भाईचारे को बिगाड़ रहा है और सरकार चुप है  
विज्ञापन का सोशल मीडिया पर जम कर विरोध किया जा रहा है. हिंदुस्तान यूनिलीवर के उत्पाद सर्फ एक्सेल का बहिष्कार करने की अपील भी की जा रही है. कहा जा रहा है अपनी बहुसंख्यक आर्थिक ताकत से इसे झुकाइये, ताकि सर्फ एक्सेल ये विज्ञापन वापिस ले औऱ भविष्य में दोबारा ऐसा दुःसाहस न कर सके. 




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