शाम


''वो शाम कुछ ...'' कुछ याद आया, और एक यह ''शाम ''सुरेन्द्र नगर गुजरात से विश्वगाथा के सम्पादक श्री पंकज त्रिवेदी जी की एक खूबसूरत कविता ''शाम ''

शाम 
गंभीर सी थी 
मेरे अंदर-बाहर !

शाम 
होते ही चूड़ियाँ खनकती 
कभी अंदर-बाहर !

शाम 
मुस्कुराती, आज उदास थी 
मेरे अंदर-बाहर !

शाम 
बनकर वो आती कभी-कभी 
मेरे अंदर-बाहर !

शाम 
अकेलापन महसूस करती है 
तुम्हारे अंदर-बाहर !


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News Digital India 18

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