तेजी से घट रहा जलस्तर, सूखे पड़े हैं कुएं, खेती सिंचित करने पानी कहां से लाओगे?




''वर्तमान में सरकारें सिंचित जमीन का रकबा बढ़ाने पर खूब जोर दे रही हैं, अच्छी बात है, लेकिन किसी का भी ध्यान जमीन के भीतर बहुत तेजी से घटते जलस्तर पर नहीं है।''



इंदौर से प्रमेंन्द्र ठाकुर     


मारे गाँव के कुयें का पानी अब फरवरी के महीने में ही खत्म हो जाता है, जबकि मेरे बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भी इस कुयें के पानी को गर्मियों के मौसम में भी खत्म होते नहीं देखा और ना ही उन्होंने अपने बुजुर्गो से कभी इस कुयें का पानी खत्म होने की बात सुनी थी। 

तो फिर कुंआ सूखा क्यों? 
पता चला कि गांव के आसपास खेतों में सबने सिंचाई के लिए बोरिंग करा लिये हैं और धीरे-धीरे जमीन के भीतर पानी का स्तर कम होता चला गया और उसकी परिणीति यह हुयी कि गांव में और गांव के आसपास जमीन के भीतर पानी का स्तर सैंकड़ों फिट नीचे जा चुका है और यह जलस्तर धीरे धीरे और नीचे जाना ही है।

रही बात नदियों की तो नदियों का हम जिस तरह से शोषण कर रहे हैं, नदियां भी सूखती ही जा रही हैं, लेकिन हम अपनी करतूतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

ऐसे में हम कितना भी खेती की जमीन का सिंचित रकबा बढा दें, लेकिन उस सिंचित जमीन में खेती करने के लिए पानी कहां से लाओगे? क्या कोई भी इस बारे में सोच रहा है? उत्तर भी बढ़ा स्पष्ट है नहीं.. एक बार सोच कर जरूर देखियेगा कि हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ कर जा रहे हैं?

अभी भी समय है चेतन्य जाग्रत हो जाइये और पेड़-पौधे लगाइये, रैन वाटर हारवेस्टिंग पर जोर दीजिये, क्योंकि अगर आज हमने प्रकृति की चिंता नहीं की तो भविष्य बड़ा ही भयावह है।




मुद्दे पर श्री  चक्रधर झा जी कहते हैं  इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है. सभी दोहन करने में लगे हैं. प्रकृति चक्र से अनजान प्राकृतिक संसाधनों का विनाश ही एक दिन धरती के विनाश का कारण बनेगा..


वहीं श्री अनुराग शुक्ला का कहना है कि पहले घर के अंदर के कुएं खत्म हुए, फिर मोहल्ले के, फिर गाँव की बावड़ी या पोखर/तालाब. आजकल नदियों की शामत आई है. 
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी. अब लोग फिर से खेतों में तालाब बनवाने लगे हैं. इंतज़ार करना पड़ेगा. इंसान की फ़ितरत है कि बातें तो बड़ी बड़ी कर भी ले, पर समझदारी का काम मजबूरी में ही करता है.





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