'नाथ' सरकार का ऐसा 'अनाथ' आचरण, क्या ‘मिस्टर बंटाधार’ की प्रेत छाया का असर है?


कमलनाथ को समझना होगा कि उनकी यह सदाशयता समूची सरकार को लाचारी वाली स्थिति से जूझता बता रही है। इससे प्रदेश की उस जनता का यकीनन कांग्रेस से मोह भंग होगा, जिसने इस बार यह सोचकर इस दल को वोट दिया कि कांग्रेस की नई सरकार में दिग्विजय की भूमिका नगण्य होगी। वरना ‘मिस्टर बंटाधार’ की प्रेत छाया का ही असर था कि जनता ने पूरे पंद्रह साल तक भाजपा को जीत का मौका प्रदान किया।   



प्रकाश भटनागर 


पुराना वाकया है। भोपाल के पुराने हिस्से से जुड़ा हुआ। वहां रहने वाले मित्र ने दावत पर बुलाया था। चुनाव का समय था। मकान के नीचे की सड़क पर एक सज्जन जीप पर माइक लगाए भाषण दे रहे थे। हम सभी केवल उनकी आवाज ही सुन पा रहे थे। वह बोले, ‘इलाके में अमन के लिए मुझे वोट दीजिए। इंसानियत और भाईचारे के लिए मुझे खिदमत का एक मौका दें।’ 

इस तरह की बातें कहते-कहते अचानक उनका सुर बदला। गुस्से में किसी की मां-बहन का पुण्य स्मरण करते हुए बोले, ‘...काट के रख दूंगा स्साले। जानता है शहर के हर थाने में मुझे पर केस दर्ज है! वो भी उठाइगिरी के नहीं, कत्ल की कोशिश के, घर में घुसकर चाकू मारने के! सामने आ, बीच सड़क पर तेरी अंतड़ियां बाहर न निकालीं तो मैं भी एक बाप की औलाद नहीं.....!’ वह गालियों की बौछारों के बीच दनादन यह कहते चले गये। यह याद रखे बगैर कि उनके हाथ में मौजूद माइक चालू था। 

हम लपककर खिड़की पर गये। तब माजरा पता चला। किसी ने उनके ऊपर अंडा फेंक दिया था। जिससे वह आपा खो बैठे और खुद की असलियत माइक के जरिए उस जनता के सामने प्रकट कर दी, जिसे चंद पल पहले वह शांति और सुरक्षा की दुहाई दे रहे थे।


इंदौर के विमानतल पर कल एक मोबाइल फोन के चालू स्पीकर पर राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ का पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जो संवाद हुआ, वह इस किस्से की तरह ही विचित्र और दयनीय दशा वाला मामला है। उससे भी प्रदेश में मौजूद सरकार नामक संस्था की असलियत सामने आ गयी है। और यह भी समझ में आ गया कि कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने इस आम चुनाव को कांग्रेस के दिग्गज नेता किस हलके अंदाज में ले रहे हैं। 

समझ नहीं आता कि कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं तो मुख्यमंत्री जैसा दमदार आचरण क्यों नहीं कर पा रहे? और दिग्विजय अब एक पूर्व मुख्यमंत्री से ज्यादा प्रदेश में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं। उनसे संजीदगी की उम्मीद ही की जा सकती है। खासकर, तब और ज्यादा जब विधानसभा चुनाव में उनकी अहम भूमिका को याद किया जाए। लेकिन पता नहीं कैसे कब उनकी ठकुरास जाग जाए है। 

दिग्विजय का आचरण दम्भ से भरा हुआ नजर आता है। कांग्रेसियों की भीड़ के बीच लोकसभा टिकट के नाम पर ‘जो मांगोगे, वो मिलेगा’ के घमंड में वे चूर-चूर थे। क्या यह होली के महीने की मस्ती का सुरूर था कि गुरूर से भरे दिग्विजय ने मुख्यमंत्री को फोन लगाकर स्पीकर आॅन कर दिया! प्रदेश के मुख्यमंत्री को बगैर बताये उससे की जा रही अहम बातचीत को सार्वजनिक कर दिया जाता है और वह भी इतने हल्के अंदाज में! 

इससे भी विडंंबना यह कि नाथ भय से ग्रस्त दिखते हैं। जिस पार्टीजन को वह इसी बातचीत में जीतने की क्षमता से विहीन बताते हैं, स्पीकर आॅन होने की बात सुनते ही उसे ही वह विनिंग कैंडिडेट बता देते हैं। क्या यह इंदौर के उस सीनियर कार्यकर्ता का अपमान नहीं माना जाना चाहिए? नाथ आखिर किस बात से इतना डर रहे हैं? इतना कमजोर मुख्यमंत्री! जो अपनी ही पार्टी के एक कार्यकर्ता से डर जाए, उससे पार्टी के बाहर के तमाम मोर्चों पर समयानुकूल दबंग रुख दिखाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है!

पता नहीं दिग्विजय सिंह की ‘तन की शक्ति, मन की शक्ति’ का राज क्या है, लेकिन कुछ तो है। मध्यप्रदेश के राजनीति में वह लालू प्रसाद यादव जैसा आचरण करने पर उतर आये हैं। यादव का उदाहरण उस समय का, जब नीतिश कुमार की सरकार उनके दल के समर्थन से चल रही थी। तब लालू बिहार के शैडो चीफ मिनिस्टर के सदृश नजर आते थे और आज दिग्विजय उसी अध्याय को दड़ेगम दोहरा रहे हैं। 

नीतिश और नाथ के स्वभाव में जमीन-आसमान का जो अंतर है, उसे भांपकर दिग्विजय इस बात से आश्वस्त होंगे कि इस सारी स्वच्छंदता के बावजूद उन्हें अंतत: लालू की तरह का बुरा नतीजा तो नहीं ही भुगतना पडेÞगा। शायद यह इस यकीन का ही असर है कि नाथ की सरकार बनने के बाद से अब तक दिग्विजय उसमें समय-समय पर दखलंदाजी की हिमाकत से बाज नहीं आ रहे हैं।

कमलनाथ को समझना होगा कि उनकी यह सदाशयता समूची सरकार को लाचारी वाली स्थिति से जूझता बता रही है। इससे प्रदेश की उस जनता का यकीनन कांग्रेस से मोह भंग होगा, जिसने इस बार यह सोचकर इस दल को वोट दिया कि कांग्रेस की नई सरकार में दिग्विजय की भूमिका नगण्य होगी। वरना ‘मिस्टर बंटाधार’ की प्रेत छाया का ही असर था कि जनता ने पूरे पंद्रह साल तक भाजपा को जीत का मौका प्रदान किया। पार्टी को विजय केवल तब मिली, जब राहुल गांधी के स्तर से दिग्विजय को इस चुनाव में हाशिये पर धकेला गया था। नाथ ने डूबते हुए दिग्विजय को सहारा दिया है। किसी डूबते शख्स को बचाने वाला भी अक्सर डूबता ही है। यह बात नाथ को पता ही होगी। लेकिन वह सदाशयता की स्वभावगत मजबूरी से बाहर आएं तब ना।
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