देश प्रेम का ठेका आम जनता का है, देश के कर्णधारों का नहीं?




''चीन ने अज़हर महमूद को विश्व का आतंकी घोषित करने पर रोक लगाई है, को लेकर एक बार फिर कहा जाने लगा है कि हम यानि देश के जिम्मेदार नागरिक चीन के हर सामान का बहिष्कार करें. यहाँ तक कि चीन की यात्रा तक को रोक दें. कहा जा रहा है क्या इसमें सिर्फ सरकार की ही ज़िम्मेदारी है, हम जिम्मेदार नागरिक की नहीं? इस प्रकार से सोशल मीडिया पर खूब पेलकर ज्ञान बांटा जा रहा है.  जानिये इसकी हकीकत.'' 

दीवाली पर भी चायनीज झालरों के खिलाफ खूब जहर उगला जाता है, लेकिन होता कुछ नहीं होता. चायनीज झालरें और भी जोरों से बिकती हैं. क्या हम यह समझें कि हमारे अन्दर की देश प्रेम की भावना ख़त्म हो गई है? 

कहा जा रहा है जब चाय में पता चलता है कि कुछ मांसाहारी तत्व की मिलावट की गई है तो उसका असर होता है. चाय पीने पर स्वेच्छा से रोक लग जाती है? गज़ब का देश प्रेम दर्शाते हुए कहते हैं कुछ लोग, 'यदि आप सच्चे हिन्दुस्तानी हैं तो को चायनीज सामान पर जूते मारना चाहिये?'

फुर्सत में सोचो, गहराई में जाओ तो मामला बहुत पेंचीदा है, शुद्ध दुकानदारी है यह. भोले भाले देश प्रेमियों के देश प्रेम का अनुचित लाभ लेना भी कहा जा सकता है. इसे ऐसे समझिये- दूकान पर जब कोई तो इन बातों से प्रभावित जिम्मेदार नागरिक देशी झालर मांगता है तो दुकानदार भी अलग नजरों से देखता है. कुछ बातें होती हैं देश की, और बाद में वह देशी झालर महंगे दामों में खरीद ले जाता है, वह जिम्मेदार नागरिक. 

कोई तो सवाल उठाओ, सरकार चीन से आयात करने ही क्यों देती है? क्यों देश के व्यापारी चीन से सामान लाते हैं? सरकार यह नहीं रोक सकती क्या? न होगा बांस न बजेगी बांसुरी. या फिर यह कहा जाए कि देश प्रेम का ठेका आम जनता का ही है, देश के कर्णधारों का नहीं? 

एक सवाल यह भी है कि चायना से इतनी दूर से आकर भी वहां का सामान यहाँ सस्ता मिलता है, जबकि हमारा देशी सामान, जो यहीं बना महंगा होता है, क्यों? मध्यप्रदेश में बनती है बिजली. यहाँ से खरीद कर दिल्ली वाली सरकार, दिल्ली वालों को काफी कम दाम में देती है, वहीं मध्यप्रदेश के अपने लोगों को महंगी मिलती है. 

हाल में पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ भी 'व्यापार ख़त्म करो' की खूब बातें हुईं, लेकिन वही ढाक के तीन पात. पाकिस्तान से भी व्यापार खूब चल रहा है. खूब खिलाये जा रहे हैं पाकिस्तानियों को टमाटर भी. 

देश में शराबबंदी की बातें भी खूब होती हैं, लेकिन शराबबंदी नहीं की जाती. शराब बनती है, बनाने दी जाती है. और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, बताने के लिए भी प्रचार प्रसार पर पैसा बहाया जाता है. सिगरेट बंद नहीं होगी, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक लिख दो बस. बताइये यह क्या बात हुई. आपको नहीं लगता कि यह हमारे साथ एक बड़ा मजाक किया जा रहा है?  

सच यह है कि विशुद्ध राजनीति है यह. इसके चक्कर में मत पड़ो. अपने ढंग से खुल कर जिओ. सारा आकाश, सारी दुनिया तुम्हारी है. पाकिस्तान, चायना भी. फिर किससे, कैसा लड़ना...? 

"बर्बादे गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जाम-ए -गुलिस्तां क्या होगा?"


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