देश में जबरदस्त 'एंटी इनकम्बेंसी', जनता नहीं खोल रही पत्ते, नतीजे बहुत चौंकाने वाले होंगे


''यदि कोई मीडिया समूह, चैनल या अखबार नहीं उठा रहा है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि देश में 'एंटी इनकम्बेंसी' नहीं है. जहाँ तक हमारा विश्लेषण कहता है देश में जबरदस्त 'एंटी इनकम्बेंसी' का माहौल है. जन सरोकार से जुड़े कई अहम मुद्दों गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की तो कोई बात ही नहीं कर रहा. ले दे कर हर बात में पाकिस्तान, गर्व, शौर्य चल रहा है. 'एयर स्ट्राइक' का नशा भी अब उतार पर है. नयी वाली 'स्पेस स्ट्राइक' पर लोग अब हँस रहे हैं. जनता अपने पत्ते नहीं खोल रही. चुनाव बेहद दिलचस्प, नतीजे भी बहुत चौंकाने वाले होंगे.'' 
- गिरीश मालवीय  

चुनाव बेहद नजदीक आ गए हैं, लेकिन वह एक बात कोई भी मीडिया समूह, चैनल या अखबार नहीं उठा रहा है, जो इससे पहले हर चुनाव का सेंट्रिक पॉइंट होता था यानि 'एंटी इनकम्बेंसी'. यदि कोई मीडिया समूह, चैनल या अखबार नहीं उठा रहा है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि देश में 'एंटी इनकम्बेंसी' नहीं है. जहाँ तक हमारा विश्लेषण कहता है देश में जबरदस्त 'एंटी इनकम्बेंसी' का माहौल है. यही कारण है कि बड़ी संख्या में वर्तमान सांसदों के टिकिट काट दिए गए हैं. 

अभी तक जितने भी चुनाव हुए हैं उन चुनावों का जब विश्लेषण किया जाता था तो सबसे विशेषज्ञ पहला शब्द 'एंटी इनकम्बेंसी' ही बोला या लिखा करते थे. सवाल उठता है कि अब क्या मोदी का ख़ौफ इतना अधिक है कि कोई भी हिंदी समाचार पत्र या न्यूज़ चैनल इस शब्द को इन लोकसभा चुनावों के अंदर इस्तेमाल भी नही कर रहा है?

आप को एक बार याद दिला दूं कि बीजेपी पिछले 5 सालों में अधिकतर लोकसभा के उपचुनाव हार गयी है. गुजरात में जो इनका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, उसमें यह हारते हारते बचे हैं. ये कर्नाटक में हारे हैं, राजस्थान, छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश में इन्होंने पटखनी खाई है. साफ है कि नोटबन्दी ओर जीएसटी के फैसले के बाद जनमत इनके विरुद्ध हुआ है यानि एंटी इनकम्बेंसी अपना असर दिखला रही है. अन्दरखाने की मानें तो 'क्यों पड़े हो चक्कर में, कोई नहीं है टक्कर में', से मन बहलाया जा रहा है. सच यह है कि अन्दर तक भय व्याप्त है, जिसे 'एयर स्ट्राइक' से संभालने की कोशिश की गई, लेकिन 'एयर स्ट्राइक' का नशा भी अब उतार पर है. नयी वाली 'स्पेस स्ट्राइक' पर लोग अब हँस रहे हैं. 

एक और दिलचस्प बात, आप सारे न्यूज़ चेंनल्स को या हिंदी अखबारों को गौर से देखिए तो आप पाएंगे कि जन सरोकार से जुड़े कई अहम अन्य गंभीर मुद्दों गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की तो कोई बात ही नहीं कर रहा है. रोजगार तो छोड़ दीजिए शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इनकी क्या उपलब्धि है, इसकी कोई चर्चा आज तक नहीं सुनी, बस ले दे कर हर बात में पाकिस्तान, गर्व, शौर्य को खींच लाते हैं. 

एक बात यह भी है कि इनका सारा तथाकथित जादू उत्तर भारत के हिंदी हार्ट लेंड पर ही चल रहा है, दक्षिण इससे बेअसर है. जिसे मोदी लहर कहा जाता था, उसमें भी यह अधिक से अधिक 282 सीटें ही जीते हैं. यह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार में यह अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा नहीं पाएँगे. इसके अलावा तीन बड़े राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में एंटी इनकम्बेंसी अपना कमाल दिखलाएगी. उसकी भरपाई यह उत्तरपूर्व ओर पश्चिम बंगाल से करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन विश्लेषक बताते हैं जितनी सीटें यह उपरोक्त राज्यों में हार रहे हैं, वह कमी यहाँ से तो पूरी होने से रही.

इस हिन्दी हार्ट लेंड में आने वाले बड़े छोटे शहर में इनका जरूर जोर है, लेकिन किसान और आदिवासी इलाकों में जनता चुप लगाकर बैठी हुई है. कुछ ऐसी ही स्थिति हमें छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में देखने को मिली थी, जब जनता अपने पत्ते नहीं खोल रही थी. ऐसा लगता है जैसे वह घात लगा कर बैठी है. कुल मिलाकर यह चुनाव बेहद दिलचस्प है और नतीजे भी बहुत से लोगों चौका सकते हैं.


और अंत में 
कबीर जी ने कहा है 'निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाये, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय', व्यक्ति को सदा चापलूसों से दूरी और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास ही रखना चाहिए, क्यूंकि निंदा सुन कर ही हमारे अन्दर स्वयं को निर्मल करने का विचार आ सकता है, लेकिन नहीं, यहाँ उलटा है. गलत को सही न बोलो, सच बोलो, खिलाफ बोलो, आइना दिखाओ तो देशद्रोही और कांग्रेसी. सो आईना दिखाने वाले भी खामोश हो गए.    

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