जो अंधेरे में घिर कर दम तोड़ देते हैं, उनके लिए एक नई रोशनी देती खबर ''इनके साहस को प्रणाम''


भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- ''कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्...'' अर्थात कर्म करो, फल की इच्छा मत रखो। जो इस सीख पर चला, वह समाज के लिए अनुकरणीय बना। मघ्यप्रदेश की तीन महिलाओं ने कुष्ठ रोगियों और उनके परिजनों के लिए ऐसा ही उदाहरण पेश किया है, जिसे सुनकर ही उन्हें प्रणाम करने की इच्छा हो गई। 
- संजय सक्सेना   

जो लोग कुष्ठ रोग और इसके प्रभाव के घनघोर अंधेरे में घिर कर दम तोड़ देते हैं, यह खबर उनके लिए एक नई रोशनी साबित होगी। वे भी औरों की तरह इस बीमारी से पीडि़त हैं.. लाचार हैं, लेकिन उन्हें किसी की सहानुभूति नहीं मिलती है। 21वीं सदी में भी वे पिछले जन्म के पापों का ताना सुनकर शहर के किसी कोने में परकोटे को अपना इलाका मान रहने को मजबूर हैं। आज भी उन्हें पास बैठाने में लोग कतराते हैं। समाज की दकियानूसी सोच कुष्ठ रोगियों को मेहनत की दो जून की रोटी खाने की इजाजत देने को तैयार नहीं है, लेकिन अब उनकी बेटियों और बहुओं ने मिलकर उनके माथे से यह कलंक ही नहीं मिटाया, अपितु इन रोगियों के परिवारों को एक नई राह भी दिखाई है। 

हीरा भंडारी, सरिता धुंधले और रीना सांकरे को दुनियाभर में कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सासाकावा इंडिया लेप्रेसी फाउंडेशन द्वारा 2017-18 में राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश से इन तीनों का चयन किया गया और एक लाख रुपए के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तीनों ने समाज की धारणाओं से लड़कर अपने माता-पिता और सास-ससुर को भिक्षावृत्ति से बाहर निकाल लिया है। आठ साल का समय लगा लेकिन रेडीमेड कपड़ों का अपना कारोबार खड़ा कर लिया। आज वे न केवल अपने पैरों पर खड़ी हैं, बल्कि पूरे परिवार को मेहनत की रोटी खिला रही हैं। कभी भीख मांगने जाने वाले उनके माता-पिता और सास-ससुर भी उनका हाथ बंटाते हैं। 40 वर्षीय हीरा भंडारी के साथ मां भागाबाई रहती हैं। भागाबाई कुष्ठ से पीडि़त हैं। जब पिता लक्ष्मण जीवित थे तो दोनों मिलकर भिक्षावृत्ति करते थे। पिता की मौत के बाद बेटी हीरा मां और परिवार का सहारा बनी। 

इसी तरह 36 वर्षीय सरिता धुंधले ने मां शांताबाई, पिता घनश्याम तथा 30 वर्षीय रानी सांकरे ने सास-ससुर को भिक्षावृत्ति से बाहर निकाला है। हीरा कहती हैं हम तीनों ने मिलकर पहले कपड़ों की दुकान खोली। शुरू में ज्यादा लोग नहीं आते थे, इसलिए खर्चा निकालने के लिए सिलाई का काम भी करना पड़ा। अब हर व्यक्ति को 7000- 8000 रुपए महीने की आमदनी होने लगी है। परिवार आर्थिक रूप से घर चलाने में सक्षम हो गया है। हमारे बुजुर्ग घर की देखभाल करते हैं। रानी सांकरे तो एक ऐसे परिवार से हैं जहां किसी को भी कुष्ठरोग नहीं है। पर उनके सास-ससुर को कुष्ठ रोग था। शादी के बाद बेटे को माता-पिता से दूर करने के बजाए इन्होंने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना शुरू किया और आज अपने सास-ससुर की चहेती बनी हुई हैं।

कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली संस्था सहयोग कुष्ठ निवारण संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुदामा सारंग गायधाने के मुताबिक कुष्ठ रोगियों को मुख्य धारा से जोडऩे के लिए इन्हें स्वरोजगार से जुडऩे के लिए आर्थिक मदद की जाती है। हीरा, सरिता और रानी को जब 2010-11 में मदद मिली थी तो यकीन नहीं था कि तीनों मिलकर इस तरह से अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी। इस साल भी मध्य प्रदेश से 100 लोगों को मदद के लिए चुना गया है।

ठीक है, कुछ संगठन भी मैदान में हैं। काम कर रहे हैं, लेकिन जब तक स्वयं की इच्छा शक्ति नहीं होती, स्वयं हम साहस नहीं जुटा पाते, तब तक कोई हमारा जीवन नहीं बदल सकता। संस्था, सरकार, संगठन कुछ मदद कर सकते हैं। आगे तो हमें खुद ही बढऩा होता है। सरकार को भी चाहिए कि जो संस्थाएं वास्तव में काम कर रही हैं, उन्हें और अधिक मदद दी जाए, ताकि वे अपना विस्तार करें और लोगों को अंधेरों से बाहर निकाल कर समाज की मुख्य धारा में लेकर आएं। हमारे यहां तो कुष्ठ रोगी केवल भिक्षावृत्ति तक ही सिमट कर रह गए हैं। बचपन में एक गाने की लाइन गाते हुए निकलते थे- देने वाले श्री भगवान। 

अब विश्व बदल रहा है। मान्यताएं भी बदल रही हैं। कम से कम उन मान्यताओं को तो बदलना ही चाहिए, जो समाज के लिए बदनुमा दाग हैं। इन तीनों महिलाओं के साहस को, उनकी इच्छा शक्ति को प्रणाम। और उन संगठनों को साधुवाद, जो आज भी ऐसा काम कर रहे हैं।
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