बातें अपनी, उस चाय के प्याले में

 - सुरेखा अग्रवाल 'स्वरा'    

अक्सर भुल जाती हूँ मैं 
बातें अपनी इधर उधर...
वह सभी की कही ...
हर शब्द जा बसते हैं फिर
मेरे दिमाग की शहतीर में ..!

महसुस होती है जब 
कि अब उन्हें पढ़ना चाहिए तो
ढूँढती हूँ मैं उन्हें
कभी दराजों में ...!
कभी सीढ़ी के पास रखी
उन पुराने अखबार के ढ़ेर में
अलमारी में रखे उन कपड़ों की 
तह में ....!
खंगालने लगती हूँ मैं 
कभी उन्हें उस चाय के 
प्याले में ...!
नहीं मिलती मुझे वह बातें कहीं भी
जानते हैं क्यों 
उन्हें मैं सहेज रखती हूँ उसी पल उन
शब्दों के कटोरे में ..!
फिर पिरोती हूँ एक एक अल्फाजों को
और बन्द कर देती हूँ एक
उस सुनहरी स्याही में ...
जो रचती है एक कहानी
तो कभी छंद तो कभी बन
मुक्तक मेरे ही अन्तस् में...!
तब जाकर पढ़ती हूँ मैं उन 
बातों को एकांत में...!
चाय की चुस्कियों संग
हर्फ़ दर हर्फ़



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