भंसाली की पारो की तरह...


एक बहुत ही सटीक, सार्थक व सराहनीय भावाभिव्यक्ति.
अपने अपनों में समाविष्ट विविध नाते-रिश्तों के प्रति एकनिष्ठ और समर्पित होता हुआ "पारलौकिक प्रेम" ही सच्चे मायने में किसी भी संवेदनशील ह्रदय की गहराइयों में उतरने में सक्षम सिद्ध होता है, वरन वो मात्र मिथ्या और क्षणिक भाव होता है, जिसे हम दूसरी तरह से प्रशंसा की चाह में सृजित आडम्बर या दिखावटी प्रेम भी कह सकते हैं. बहुत सही लिखा है शालू जी. सोशल मीडिया बहुत शक्तिशाली बन कर सामने है. काश हम लोग इसका सही दिशा में सदुपयोग करें..
प्रस्तुत है शालू जैन की एक बेहद खूबसूरत सन्देश देती कविता. देखिये- 
- अजय जोशी    

मत अन्याय कीजिए 
अपने, अपनों के साथ...
प्रेम को पहचानिए

प्रेम सब कुछ हो सकता है, पर
कभी अन्यायी नहीं...

बाढ़ आई है 
फेसबुक पर हर दुसरी पोस्ट प्रेम की 
हर तीसरे को अहसास रूहानी प्रेम का 
पर आप क्या लिख रहे हैं सोचिए, समझिए

नहीं कहती कि आप किसी को सच्चा प्रेम नहीं करते होंगे... 
बेशक करते होंगे. 
और मैं कोई हक नहीं रखती कि 
किसी पर कोई निर्णय या समीक्षा या मूल्यांकन करने का... 
लेकिन एक के लिए प्रेम दुसरे के लिए उपेक्षा...

अजीब सी कहानियां हैं प्रेम की 
सभी भंसाली की पारो की तरह... ऊफ्फफफ

यह प्रेम... सच में दम तोड़ गया..

वरना इतना प्रेम बिखरा होने पर भी 
नफरत कैसे हावी होती है‌... कोई समझाए..
- शालू जैन      

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News Digital India 18

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