कई सवाल खड़े करता हादसा, क्या जयचंद‌ कहीं न कहीं हमारे ही देश में ही हैं


''यह भी पता चल रहा है कि किसी को फौज के इस काफिले के बारे में पहले से ही पता था। वहां इस तरह की प्लानिंग एकाएक तो हुई नहीं होगी यानि जयचंद‌ कहीं न कहीं हमारे ही देश में ही हैं।''
- शालू जैन 

कुछ महीने पहले तक सरकार की ओर से एक विज्ञापन आता था .जिसमें देश के युवाओं से फौज में भर्ती होने की अपील की जाती थी ।बदले में उन्हें मिलने वाली सुविधाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा रहता था । लेकिन कहीं भी कभी भी यह जिक्र नहीं होता था कि अवाम की रक्षा के लिए सब कुछ भूलकर  खुद को मिटाने वाले की और उसके परिवार की रक्षा इस  गणतंत्र के सर्वेसर्वा कैसे करेंगे। पुलवामा दरअसल हमारी उन्हीं खामियों का नतीजा है ।

अव्वल  सवाल यह कि इतने साथ एक साथ काफिला कैसे निकला, जबकि फौज ही नहीं आम  लोग भी कहीं बाहर निकलते हैं तो एक साथ नहीं होते।फौज की कार्य प्रणाली और विज्ञान दोनों ही एक साथ इस तरह काफिले निकालने की इजाजत नहीं देते.......!!

एक सवाल यह भी कि कश्मीर भारत का हमेशा ही संवेदनशील हिस्सा रहा है जिसे अतिरिक्त साथ संभाल की आवश्यकता हर वक्त बनी रहती है। चुनावी दौरों के अलावा वहां कभी कोई नेता किसी भी पक्ष का अपना दौरा क्यो नही करता ...? (सनद रहे कश्मीर दौरे की बात हो रही है ,फौज के दौरे की नहीं ) जहां हमारे आम सैनिकों को हर पल आम नागरिकों से ही वाबस्ता होना होता है ।

पक्ष और विपक्ष  केवल एक डील के लिए जितने आरोप प्रत्यारोप कर सकते थे, में लगे रहे, लेकिन वास्तविक मुद्दों को हमेशा दबाते रहे (कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता )

यह भी पता चल रहा है कि किसी को फौज के इस काफिले के बारे में पहले से ही पता था। वहां इस तरह की प्लानिंग एकाएक तो हुई नहीं होगी यानि जयचंद‌ कहीं न कहीं हमारे ही देश में ही हैं।

क्या आपने कामों की उपलब्धि बयान करती सरकार कभी अपने एक भी मंत्री की जेड सुरक्षा हटाती है. सुविधाएं यदि इतनी ही  मिलती है तो कोई  राजनेता कभी यह हिम्मत क्यो नही कर पाया कि अपने एक बेटे‌ को फौज में भेजे‌।

कोई राजनेता(पक्ष /विपक्ष) आज भी यह  हिम्मत कर पाएगा कि खुद लेकर जाएं वो ताबूत और उस अभागी मां से ,बीबी से ,भाई बहिन से माफी मांगे अपनी सरकार की अक्षमता की इस वादे के साथ कि वो  अब जीवन पर्यंत उनकी देखभाल करेगा ,जबकि एक अनुशासन तोड़ने पर फौजी पर उचित कार्यवाही की जाती है ।

सवाल तमाम है....मसलन दस घंटे के लंबा सफर एक बस में ... असीमित मात्रा में हथियार ,सफर की जानकारी आदि अनेक लेकिन जवाब कौन देगा और कौन मांगेगा ।

व्यवस्थाएं केवल ##शहादत का तमगा देती है ,आम जनता  काल और परिस्थिति के मद्देनजर कुछ पल को भावुक होकर क्षोभ और आक्रोश, दुख और शोक  व्यक्त करता है ।और कुछ महीनों बाद सब सामान्य । कुछ ही दिनों में फिर सबकी चर्चा केवल शादी और उस में हुए खर्चे और उसके संस्कारों। की होगी ।

विडम्बना ही कही जाएगी "आज के युग में देश के देश क्षुद्रताओं के गर्त में  दबे रहने को और आम आदमी अपनी लघुताओं में जीने को बाध्य है ।"

"खामोश है जो ,ये वो सदा है 
जो नहीं है वो यह कह रहा है 
जीत ही जीत साथियों तुमको हर बार  मिले 
बस इतना याद रहे , साथी इक और भी था "

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News Digital India 18

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