मेले का मतलब खिलौनों या जलेबी तक न रहे, गुम हो गए मूल उद्देश्य ढूंढ़ने होंगे



''संथाल विद्रोह के जनक सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव ने भी जब अपनी बदहाली (घर में सूर्य की रैशनी तक न आने) का कारण पिता से पूछा था तो उन्हें बताया गया कि मेरे घर के आगे जो ठाकुर की हवेली है न, इस कारण सूर्य की किरणें यहाँ नीचे नहीं पहुंच पातीं। श्री जगदेव प्रसाद वर्मा जी वो माटी के लाल थे, जिन्हें बिहार का लेनिन कहा जाता है। आज जहानाबाद जिला के कुर्था प्रखण्ड में प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी से 4 फरवरी (तीन दिन) तक जगदेव प्रसाद वर्मा की स्मृति में शहादत दिवस के अवसर पर मेला का आयोजन किया जाता है।  मेले में आस पास के गांवों से आने वालों की संख्या काफी थी। कुर्था निवासियों के नईहर और ससुराल दोनों जगह के अतिथियों को देखी। पर मेले की वास्तविकता व मूल उद्देश्य मेले में ही कहीं गुम से हो गए थे। जिसे हमें ढूंढ़ना होगा कि आखिर इतने वर्षों बाद भी मेला लगा कर उनकी स्मृतियों को धूमिल न पड़ने देने की वजह को सार्थक किया जाय, न कि अबोध की भांति खिलौनों या जलेबी के लिए मचला जाय।''
आलेख एवं चित्र / उषालाल सिंह     

जहानाबाद जिला के कुर्था प्रखण्ड में प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी से 4 फरवरी (तीन दिन) तक जगदेव प्रसाद वर्मा की स्मृति में शहादत दिवस के अवसर पर मेला का आयोजन किया जाता है।

श्री जगदेव प्रसाद वर्मा जी वो माटी के लाल थे, जिन्हें बिहार का लेनिन कहा जाता है। इनका बचपन ही आर्थिक तंगी के साथ- साथ समाज की शोषकपूर्ण नीतियों से जूझते बिता। आज जहां बच्चे गोद से उतरते पाठशाला की रुख करते हैं और मुश्किल से चौदह या पन्द्रह वर्ष की अवस्था में मैट्रिक पास कर लेते हैं वही जगदेव बाबू की स्थितियां ऐसी थीं, कि उन्होंने बाइस वर्ष में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पिता इतने खुश थे कि इस उपलक्ष्य में गाजे बाजे के साथ पूजा करवाने की योजना बना रहे थे। तभी पिता जी की अकाल मौत ने उन्हें इस कदर व्यथित किया कि पल भर में आस्तिकता की दामन छोड़ नास्तिक बन बैठे पिता की अर्थी के साथ ही सारे देवी देवताओं को चिता की अग्नि में समर्पित कर दिया।


साथ ही सारे कर्मकांड को अपनाने से इनकार कर गए।इनमें वो आत्म विश्वास था कि दादा भी विरोध न कर सकें या कहिये की दादा जी भी इनके तर्क के आगे घुटने टेक दिए। इनके इस काम के बदले जहां इनको शाप दिया गया पर ये विचलित न हुए।जिसका अनुसरण आगे चलकर लोगों ने किया। भविष्य में अर्जक संघ के स्थापना की यही नींव बनी।इस संघ ने भी सारे कर्मकांड अपने तरीके से करवाने लगे पर आंखे बंद करके नहीं बल्कि खुली आँखों से। ब्याह संस्कार भी यहाँ होने लगे जिसमें ब्राह्मणों और उनकी मान्यताओं का खंडन के साथ पूर्ण बहिष्कार भी किया गया था।

संथाल विद्रोह के जनक सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव ने भी जब अपनी बदहाली (घर में सूर्य की रैशनी तक न आने) का कारण पिता से पूछा था तो उन्हें बताया गया कि मेरे घर के आगे जो ठाकुर की हवेली है न इस कारण सूर्य की किरणें यहाँ नीचे नहीं पहुंच पातीं, तब उन चारों भाइयों ने प्रतिज्ञा की थी कि हर हाल में उस हवेली को ढाहना है, जिससे हमारा विकास अवरुद्ध है।
कुछ इसी तर्ज पर जगदेव बाबू ने भी शोषितों की बदहाली का कारण शोषकों की शोषण पूर्ण नीतियों को माना, जिसके वे अन्यों की भांति स्वयं भी भुक्तभोगी थे।

एकदम रामचन्द्र शुक्ल की भांति जो नेता के साथ ही चम्पारण के किसान थे और उन्होंने ही आग्रह कर गांधी जी को चम्पारण बुलाया था। जहां से उनका पहला सत्याग्रह के साथ जी राजनीतिक जीवन को आयाम भी मिला था।

जगदेव बाबू सिर्फ अपने हक़ के लिए नहीं लड़े बल्कि पूरे दबे कुचले समाज के लोगों को संगठित व जागरूक करने का काम किया। मार्क्स की सामाजिक बनावट जिसके आधार (अधिसंरचना )में सँख्या सबसे अधिक, श्रम सबसे अधिक पर संसाधन सबसे कम जबकि समाज के ऊपरी बनावट में स्थित लोगों की संख्या कम संसाधन अधिक और श्रम सबसे कम परन्तु लाभान्वित सबसे अधिक।

उनकी सोच जहां अपनी घर की सभी महिलाओं को असूर्यमपश्या बनाने की थी तो पिछड़ों ,शोषितों की नई नवेली नार को भी खेतों में परिजनों संग झोंक देने की नीति थी, जिसे बाबू जगदेव की सूक्ष्म नजरों ने अवलोकन किया और अपने समुदाय के लोगों से आग्रह कि उनकी खेतों में धान रोपने खुद उनकी घरों की महिलाएं ही जाएंगी।

इनकी नजदीकियां राम मनोहर लोहिया, डॉ भीम राव अंबेडकर जी के साथ भी रही। आज ये भले इस दुनियां में नहीं हैं पर इनके दिखाए मार्ग पर लोग चल पड़े हैं। कही कहाई बातों में विश्वास करने के बजाय खुद भी जांचने परखने लगे हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि धार्मिकता, अंधविश्वास, कर्मकांड को वैज्ञानिक विचारों ने चुनौती दे डाली है। पुराने मूल्य टूट रहे हैं नई मान्यताएं अपनी जड़ मजबूत कर रही है।

इस तरह निखरते जगदेव बाबू सामंतों की आंख की किरकिरी बन बैठे और उन्हें सरे आम भीड़ में उनकी हत्या कर दी गई।



जगदेव जी के बारे में आज से पहले मैं बिल्कुल अनजान थी। आश्चर्य इस बात की है कि अभी तक के स्कूली या कॉलेज के पाठ्यक्रमों में भी इन्हें आज तक शामिल नहीं किया गया। शायद यही वजह है कि मुझ जैसे कई लोग आज भी अनजान होंगे।

मेरा बचपन भी बाग के पौधे की तरह बीता, जिसके आस पास खर पतवार तक न पनपा। उतना देख सुन व समझ सकी जितना माली ने दिखाया। पर न जाने इस पौध से बाग को क्या नुकसान हुआ कि उखाड़कर सीधे गांव की ऊसर भूमि में प्रत्यारोपित कर दिया गया। जहां वो पहले कुम्हलाई फिर आहिस्ता आहिस्ता अपनी जड़ें मजबूत की। जब परिपक्वता आयी तो इसकी खुश्बू शायद खेत की माली को रास आयी। बस उजड़ा पौध आज अपने खेत की शोभा बन बैठी है। वर्षों बाद भी इसका ख्याल रखा जाता है।

अब तो शहरों में रहने के बाद भी गांव उतना ही प्यारा है जहां से उसे वास्तव में पहचान मिली। कुछ दिन पहले अपने गांव अरवल जाना हुआ था तब पता चला कि 2 फरवरी को कुर्था में जगदेव मेला लगता है। मुझे जानकारी तो नहीं थी पर सभी कहते बड़ी भारी मेला लगता है। तीन दिन तक रहता है।

बस मन ही मन निश्चय किये कि इस बार इस मेला को घुमा जाय। पर संयोग ऐसा कि 2 फरवरी को ही परिवार में आकस्मिक निधन की सूचना मिली। अब मेला की बजाय गांव जाना पड़ा। पर अगले दिन वापसी में कुर्था पहुँच ही गई।

ये मेला भी बाकी मेला की तरह ही था। जहां जमीन पर ही दुकान लगाए सिंदूर, टिकुली, झुमका, क्लिप की दुकान पर महिलाओं, युवतियों की भीड़, तो खिलौनों की सजी दुकानों को देख नन्हें मासूमों की जिद, तो कहीं मेला घूम थक चुके लोग गर्मागर्म जलेबियाँ तौलवाने में लगे थे तो कुछ किताब की भी दुकानें सजी थीं, जहां कर्मकांड की किताबों की भी भरमार थी। कुछ युवतियां मनचाहा वर प्राप्ति हेतु वृहस्पतिवार व्रत कथा की किताब का मोल भाव करवा रही थीं, तो कुछ सुंदरकांड को उलट पलट रही थीं।


एक दो दुकानों पर कलेंडर, व जगदेव बाबू से सम्बंधित किताबें दिखी। जानकारी तो थी नहीं इसलिए इनसे सम्बंधित किताब खरीदना पहली प्राथमिकता रही। जगदेव प्रसाद वाङ्गमय-डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह और शशिकला जी द्वारा लिखित। साथ ही एक और पतली सी किताब, शोषित क्रांति नायक बहुजन लेनिन बाबू जगदेव प्रसाद (जीवन एवं मिशन)- लेखक दयाराम भी खरीदी।

जगदेव बाबू की प्रतिमा पर माल्यापर्ण किया गया था इसलिए प्रतिमा तो सुशोभित थी पर प्रतिमा स्थल अपनी जीर्णावस्था बयां कर रहा था न पेंट न पॉलिश।

स्थानीय लोगों की जुबानी हर साल यहाँ इनकी मिट्टी की मूर्तियां भी बनती थी पर इस बार कैलेंडर से ही प्रदर्शनी सजाई गई थी जिससे मेला घूमने वाले थोड़ा छुब्ध थे।

बीच परिसर में मंच बना था, जिस पर कई लोग विराजमान थे। मंच से सुधिजनों का भाषण तो चल रहा था, पर उसे सुनने वालों लोगों की प्रतिशतता नगण्य थी। मंच सम्हालने वालों में प्रौढ़ों व वृद्धों की संख्या का अधिक का होना ये सूचित करता है कि युवाओं का देश आज इस विभूति से अनजान हैं। कुछ देर ठिठक कर सुनना भी चाही तो सबकी घूरती निगाहों ने मुझे ही भीड़ में अलग खड़ा कर दिया, पर जितनी बातें भी सुनी उसका अर्थ यही समझ आया कि
"बाबा साहब का सपना ही जगदेव तुम्हारा नारा है,
सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।''
बाकी की अधिकतर बातें सोशल मीडिया की तैरती खबरें ही रहीं।

पास ही धूल धूसरित दरी बिछी थी। जिनकी सिलवटें गवाही दे रही थी कि बीती रात लोग इनकी शरण में थे। आस- पास दस बारह कुर्सियां लगी थी। जो आधी से अधिक खाली पड़ी थी।

मेला घूमने वालों में बस वैसे लोगों की ही बहुलता थी, जिनके लिए घर से बाहर निकलना किसी उत्सव के समान था। बस उसी तरह धराउं साड़ी, भर हाथ चूड़ी, ललाट पर चमकती टिकुली, मातृत्वता को पूर्णता देती गोद में दूध मुहें बच्चे, कुछ दादा, नाना की उंगली थामे बच्चे तो कुछ पिता की कांधों पर बैठे फिर भी सुरक्षा के ख्याल से उनकी बालों को मुठ्ठी में जकड़े थे। पैंट-शर्ट वाले बाबुओं से अधिक संख्या सफेद कुर्ता धोती, जो उनकी उम्र के साथ ही पीली पड़ गई थी की सँख्या ज्यादा थी।

आस पास के गांवों से आने वालों की संख्या काफी थी। कुर्था निवासियों के नईहर और ससुराल दोनों जगह के अतिथियों को देखी। पर मेले की वास्तविकता व मूल उद्देश्य मेले में ही कहीं गुम हो गए थे। जिसे हमें ढूंढ़ना होगा कि आखिर इतने वर्षों बाद भी मेला लगा कर उनकी स्मृतियों को धूमिल न पड़ने देने की वजह को सार्थक किया जाय न कि अबोध की भांति खिलौनों या जलेबी के लिए मचला जाय।

मेला वापसी में बस में एक सज्जन बृजनन्दन प्रसाद नवादा निवासी जो 35 वर्षों बाद जगदेव मेला आये थे और उनकी चाहत थी कि रात में रुकने की। पर बदलते समय ने बहुत कुछ बदल दिया है, जिसके कारण मात्र घण्टे भर में ही वापसी का टिकट कटा बैठे। उनके अनुसार उस वक्त ज्यादा सुविधा व व्यवस्था थी।

इस बार तो समयाभाव के कारण मेला को ठीक से न समझ सकी पर कोई बात नहीं अगले वर्ष मेला के इंतजार में ...


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