पत्थर के सीने से जब भी






पत्थर के सीने से जब भी फूटा, मीठा, शीतल नीर बहा 
जब कसक उठी उर में,पथरीली नैनों से खारा ही नीर बहा

पत्थरों को देखती रही, कैसी पीड़ा से हो विवह्ल तुम
नारी भी तो है तुझ सम ही, बस फर्क इतना कि

तू अविरल पिघलती रही और वो चोट खा हर दम सिसकती रही.. 


उषालाल सिंह, पटना 



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News Digital India 18

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