सांझी कला


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ब्रजभाषा ब्रज की जैसी मधुर भाषा
वैसे सांझी कला ब्रज की लोककला है
पर दिखने में तो रंगोली जैसी ही लगती
ये श्रीकृष्ण के प्रति श्री राधा जी का
विशुद्ध प्रेम का प्रतिबिंब थी!
सांझी का अर्थ शाम श्रृंगार है
वर्ष में एक खास मौके पर बनाई जाती
विभिन्न राज्यों में भी बनाई जाती है
जो पौराणिक रूप से ब्रज की कला से भिन्न है!
एक मिथक है कि राधा जी ने ही इस
कला का श्रीगणेश किया था
जब शाम को कृष्णजी उनसे मिलने
उन्हें रिझाने के लिए आते थे
विभिन्न फूलों से तरह तरह की
कलाकृतियाँ बनाया करती थी
जब कृष्ण जी मथुरा चले गए तो
उनके वियोग में भी राधा जी ने
अपनी सखियों संग दीवारों पर रंगो,
रंगीन पत्थरों और धातु के टूकड़े के साथ
सांझी बनाया करती थी!
द्वापर युग के बाद मथुरा और
वृदावन के असपास सांझी कला
बेहद बारीकी के रूप में उभरी !
सूखे रंगो की सांझी
पानी के अंदर सांझी
पीनी के ऊपर सांझी
गोबर की सांझी
फूलों की सांझी
के रूप में!
पर अब विलुप्त होने के कगार पर है
जैसे कोई जीव जंतु या प्राणी होते
इस संस्कृतिक कला को 
ऐतिहासिक धरोहरों जैसे 
संरक्षण की अब आवश्यकता है
अगर अब न सांझी कला को बचाया तो
शाम की तरह यह कला ढल जाएगी
केवल पन्ने पर शब्दों में रह जाएगी!
कुमारी अर्चना
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News Digital India 18

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