उसका असाधारण होना


Image may contain: 1 person
चित्र साभार / गूगल

वो साधारण सी ही रही...
पर कौन देखता उसका असाधारण होना ?
उसके ख्याल आत्मा से परमात्मा तक,
उथल -पुथल मची रहती
चिंता व्यक्त करने को
विषाणु- जीवाणु से लेकर
पकृति के प्रदूषण और
छीजते ओजोन लेयर तक
धरती से चाँद तक
ग्रह से नक्षत्र तक!
निहार लेती थी खिड़कियों से ...
फिर
लौट आती थी अपनी
कढ़ाई से कलछी तक ,
कूट लेती थी ढेर सारा अदरक ,
साथ ही उनमें कूटती थी वो दुखद यादें...
परोसती थी ढेर सारा स्वाद !
मनुहार करके खिलाना उसका ...
कभी कभार ही खीजते देखा था ...
बन्द कर आई थी किसी सन्दूकची में
अपने सपने! अपना बचपन ! अपनी डिग्रियां!
कभी- कभार झांक कर मुस्कुरा लेती थी उनमें।
अब उन सपनों को रचती थी हर दिन
रंग देती थी कितने ही कोरे पृष्ठों को
अपने शब्दों से...
नहीं सोचती कभी क्या ग़लत लिखा ...
क्या सही लिखा !
बस उसे रचना था ...
उसे भरना था हर पृष्ठ
कुछ सुखद कुछ दुखद
भींगतीं पलकों से
धुँधलाये शब्दों को
टांक आती थी
खिलती हुई सुबह की ठंडक में
कभी
कैद रातों के पहर में
उनींदी आंखों से भी
रच लेती थी अपने शब्दों का संसार।
पहन लेती अक्सर
अपनी लाल साड़ी जिसके चौड़ी थी किनारी
जिसमें रचे थे मोर ,मछलियां ,कलश स्वास्तिक
सजा लेती माथे पर ...
मेहंदी रचे हाथों में
सजा लेती पूजा का थाल ।
बड़े ही मनोयोग से रखती एक -एक फल, फूल
अक्षत रोली सिंदूर।
महावर लगे पैरों से पहुँचती
मंदिर के द्वार ...
बजा कर घण्टियाँ
खोल देती अपने हिय के शूल।
बांध आती मन्नत का धागा जिसमें
बंध जाती पूरे परिवार की सुरक्षा
हो जाती अलायें -बलायें दूर...
और सजा लेती एक स्त्री नाक से सर तक
भर माथे सिंदूर।।



- रश्मि रानी 




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a comment

abc abc