दानव, जो प्रकृति के साथ गन्दा खेल खेल रहे हैं



ईश्वर उन हैवानों को सात पीढ़ियों तक माफ न करे और उन्हें वैसा ही दर्दनाक जीवन और मौत दे, जैसा इन्होने ये कुकृत्य किया.





सुदर्शन शर्मा

'लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई'
ये पंक्तियां कुछ ऐसे ही नीच लोगों के चलते लिखी गईं और आगे भी साकार रहेंगी. ऐसे कुछ लोगों को हम जानवर भी नहीं कह सकते. वे दानवों की श्रेणी में आते हैं. ये वही लोग हैं जो प्रकृति के साथ भी गन्दा खेल खेल रहें हैं.

केरल के मल्लपुरम की बेहद दर्दनाक घटना, जिसमें एक गर्भवती हथिनी को स्थानीय गांव के निवासियों द्वारा अन्नानास के अंदर देशी बम रख कर खिला दिया गया, जिसके बाद उस फटाके में विस्फोट के बाद घायल हथिनी 2 दिन तक नदी में ही उस जलन और दर्द को रोकने के लिए खड़ी रही, पर आखिरकार वो अपने जीवन की लड़ाई हार गई. ईश्वर उन हैवानों को सात पीढ़ियों तक माफ न करे और उन्हें वैसा ही दर्दनाक जीवन और मौत दे, जैसा इन्होने ये कुकृत्य किया.


जहालत या बर्बरता? मेरे विचार में दोनों

असली वायरस तो हम इंसान ही हैं जो इस खूबसूरत धरती को बीमारी की तरह लग गए हैं


- स्वीटी सिंह 

देश के सबसे अधिक पढ़े-लिखे राज्य केरल के मलाप्पुरम इलाके के एक गाँव में -- एक हथिनी भोजन की तलाश में आ गई. गाँव के कुछ लोगों ने उसे बड़े प्यार से अनानास खाने को दिया. हथिनी ने अपनी सूंड में पकड़ अनानास को मुँह में रखा ही था कि उसमें विस्फोट हो गया.

गाँव वालों ने अनानास में आतिशबाज़ी वाला बम रख हथिनी को दिया था. हथिनी की जीभ और मुँह बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए. वह दर्द से तड़पती हुई इधर-उधर भागने लगी... लेकिन उसने इतने दर्द में भी किसी इंसान या घर को नुक्सान नहीं पहुँचाया.

भागते-भागते जब हथिनी को दर्द से छुटकारा नहीं मिला तो आखिर में वह जाकर एक नदी में खड़ी हो गई... उसने अपना मुँह पानी में डुबो लिया (शायद इसलिए ताकि मक्खियाँ उसके ज़ख़्मों पर न बैठें)... इसी तरह पानी में खड़े-खड़े और दर्द सहते हथिनी की मृत्यु हो गई.

वन अधिकारियों ने हथिनी के शरीर को पानी से निकाला और उसके अंतिम संस्कार के लिए जंगल में ले गए... वहाँ हथिनी के शरीर को जला दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने बस इतना कहा, "वह अकेली नहीं थी." 
वह हथिनी गर्भवती थी.


कभी-कभी लगता है कि असली वायरस तो हम इंसान ही हैं जो इस खूबसूरत धरती को बीमारी की तरह लग गए हैं...




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