सपा से निष्कासन पर बेपरवाह राजेश शुक्ला, बीजेपी प्रेम बने रहने पर संशय, मंत्री नहीं बनाया तो पकड़ सकते हैं कोई और राह भी


बिना लिफाफा लिए काम नहीं करते कमलनाथ ...

शुक्ला परिवार की राजनैतिक पारी में कांग्रेस की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. विधायक राजेश शुक्ला का बीजेपी से प्रेम के पीछे बड़ी वज़ह मंत्री बनने की लालसा होना बताया जा रहा है. यह भी तय है भविष्य के राजनैतिक परिणामों में राजेश शुक्ला का बीजेपी प्रेम बना रहेगा, इसे लेकर राजनैतिक जानकारों के मन में संशय है. माना जा रहा है मंत्री नहीं बनाया तो वह वापिस कोई और राह भी पकड़ सकते हैं. 


धीरज चतुर्वेदी 

अलग-अलग विचार धाराओं का जब सियासी प्रेम हो जाये तो सियासी गणित के हिसाब से  पिक्चर का नाम भी खेल खेल में और गाना तो सियासी महारथियों पर सटीक बोल कि " एक में एक और तू, दोनों मिले इस तरह.... यह सब कुछ मप्र के राज्यसभा चुनाव का गणित था. कभी कांग्रेस सरकार की सत्ता को पल्लू से सहजने वाले छतरपुर जिले के बिजावर से सपा विधायक राजेश शुक्ला ने पूर्व अनुमान के मुताबिक ही राजयसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में मतदान किया. अब समाजवादी पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया है, जो होना ही था. पारिवारिक इतिहास समय के साथ दुहराता ही है, यह एक बार फिर साबित हो गया. विधायक राजेश शुक्ला के भाई जगदीश शुक्ला भी शुद्ध रूप से कांग्रेसी थे, लेकिन एक अवसर पर उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी. विधायक राजेश शुक्ला की पारिवारिक राजनैतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से जुड़ी रही है. 


कहा तो यही जाता है कि आज जो धन दौलत की सम्पन्नता और शोहरत हासिल हुई है, उसके पीछे कांग्रेस से जुड़ाव रहा है. राजेश शुक्ला को 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बिजावर सीट से प्रत्याशी बनाया था. तब वह पराजित हो गये थे. पिछले 2018 के चुनाव में राजेश शुक्ला का कांग्रेस से टिकिट कट गया तो वह बागी हो गये. उन्होंने साईकिल की सवारी कर बिजावर विधानसभा से चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से विजय हुए. कांग्रेस सरकार को समर्थन देने के बाद वह मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेहद करीबी हो गये. उनकी नजदीकियों का अंदाज लगाया जा सकता है कि बिजावर में दीपावली के बाद होने वाले मोनिया महोत्सव में कमलनाथ ने 3 नवंबर 2019 को शिरकत की. दो दशक बाद कोई मुख्यमंत्री किसी निजी कार्यक्रम में बिजावर पहुचे थे. 

कहते है राजनीति अपनी निज महत्वाकांक्षा के लिये अवसर का खेल है. राजेश शुक्ला ने भी संबंधों को दरकिनार  कर मौका देखा. बीजेपी के प्रथम ऑपरेशन लोटस के हमले में राजेश शुक्ला भी गुरुग्राम पहुंच गये थे. तभी से सियासी संकेत मिलने शुरू हो गये थे कि अब राजेश शुक्ला का बीजेपी के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा है. कमलनाथ को जब विधानसभा में अपनों कि शक्ति की जरूरत हुई तो उनसे छिटकने वालो के बागी ग्रुप को राजेश शुक्ला का भी साथ मिला. यानि राजेश शुक्ला ओर बीजेपी की गलबइयां हो चुकी थीं. कमलनाथ सरकार गिर गई. राज्यसभा चुनाव में तय माना जा रहा था कि राजेश शुक्ला बीजेपी के पक्ष में मतदान करेंगे. हुआ भी वही कि राजेश शुक्ला ने फूल को तबज्जो दी. माना जा रहा था कि राजेश शुक्ला का  सपा से छुट्टी तय है. सपा ने राजेश शुक्ला को पार्टी से निष्काषित कर दिया है. 

बिजावर क्षेत्र में अच्छी खासी दखल रखने वाले शुक्ला परिवार का मोके पर चौका मारने वाला यह पहला वाक्या नहीं है. राजेश शुक्ला के भाई जगदीश शुक्ला कभी सत्यव्रत चतुर्वेदी के नजदीकी हुआ करते थे. जब सत्यव्रत ने विधायकी पद से स्तीफा दिया तो लोकसभा चुनाव के समय जगदीश शुक्ला ने 18 फ़रवरी 1998 को अटलबिहारी वाजपेयी कि सभा में बीजेपी का दामन थाम लिया था. सत्यव्रत चतुर्वेदी जब कांग्रेस से सांसद बने तो उन्होंने जगदीश शुक्ला को कांग्रेस जिलाध्यक्ष पद से नवाजा, जो लगभग 15 वर्षो तक इस पद पर रहे. जगदीश शुक्ला को कांग्रेस ने दो बार बड़ामलहरा क्षेत्र प्रत्याशी भी बनाया पर वह पराजित हो गये. 

2003 में वह उमाभारती के खिलाफ चुनाव लड़े तो उसके बाद 2006 में बड़ामलहरा उपचुनाव में कांग्रेस ने उन्हें मैदान में उतारा. शुक्ला परिवार की राजनैतिक पारी में कांग्रेस की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. विधायक राजेश शुक्ला का बीजेपी से प्रेम के पीछे बड़ी वज़ह मंत्री बनने की लालसा होना बताया जा रहा है. यह भी तय है भविष्य के राजनैतिक परिणामों में राजेश शुक्ला का बीजेपी प्रेम बना रहेगा, इसे लेकर राजनैतिक जानकारों के मन में संशय है. माना जा रहा है मंत्री नहीं बनाया तो वह वापिस कोई और राह भी पकड़ सकते हैं. 




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