मंत्रिमंडल विस्तार का झुनझुना बजाने के पीछे शिवराज की मजबूरी की यह है बड़ी बजह


Besides Covid, Shivraj's fighting dissent — from Congress ...

सिंधिया जी ने मुख्यमंत्री तो बनवा दिया, लेकिन शिवराज जी अपना मंत्रिमंडल विस्तार नहीं कर पा रहे हैं. 'मंत्रिमंडल विस्तार अब होगा, तब होगा' सुन सुन कर सियासी गलियारों में कान पक गये, लेकिन अभी भी कब होगा, यह कोई नहीं जानता. बजह है 'अनार कम हैं और बीमार की कोई गिनती नहीं'. डर है कि कहीं मंत्रिमंडल विस्तार करते ही 'सिर मुढ़ाते ही ओले पड़े', जैसी बात न हो जाए सो इसका एक ही हल निकाला गया है मंत्रिमंडल विस्तार भले न करो, लेकिन इसका झुनझुना अवश्य बजाते रहो, ताकि जिसे सुनकर मंत्री पद के दावेदार यह सोच कर ख़ुश रहें  कि उनका नंबर आएगा. इसी दम पर राज्यसभा चुनाव में दो सीटों पर बीजेपी का कब्ज़ा हो गया और शायद इसी झुनझुने को बजाते हुए ही वो उपचुनाव की जंग भी लड़ी जाएगी, जिसके नतीजे शिव सरकार का भविष्य तय करने वाले हैं. 


धीरज चतुर्वेदी
 

मंत्रीमण्डल विस्तार का गीत एक बार फिर गाया गया है. राजनैतिक समझदार मंत्रिमंडल के विस्तार को भी सरकार के भविष्य का पहला मोड़ बताते हैं. अगर सिंधिया टीम ना होती तो संभव था, लेकिन अगर यह टीम कांग्रेस को अंगूठा नहीं दिखाती तो बीजेपी की सरकार ही नहीं बनती. असल में तो पेंच भी कई हैं. बीजेपी में ताकत का नया खेमा बने सिंधिया को भी सैल्यूट मारना शिवराज की मज़बूरी है तो दूसरी ओर राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में ठप्पा लगाने वालों को साधना भी मज़बूरी है. बसपा, सपा और निर्दलीय भी मंत्री पद की ओर मुँह बाय तक रहे हैं. यह बीजेपी का नया गुट है, जिसकी संख्या का गणित भी सरकार को डांवाडोल कर सकता है. 


बीजेपी का नया गुट कर सकता है सरकार को डांवाडोल 
बसपा से निष्कासित रामबाई, जिन्हें सौदेबाजी के कारण ही हाथ को छिटक बीजेपी पर लाड़ आया. वह तो खुल्लम-खुल्ला कह रही हैं कि बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने उन्हें मंत्री बनाने का आश्वासन दिया है. सपा से निष्कासित बिजावर क्षेत्र विधायक राजेश शुक्ला की भी मंत्री बनने की लालसा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. निर्दलीय सुरेंद्र सिंह शेरा तो कांग्रेस, फिर बागी होकर बीजेपी और फिर कांग्रेस व अंत में फिर बीजेपी में की गई उछलकूद का कारण ही मंत्री बनने का ख्वाब है. कांग्रेस सरकार की उठापटक के समय अगर कमलनाथ सरकार बचती तो सुरेंद्र सिंह ने खुद को गृह मंत्री घोषित ही कर दिया था. सुरेन्द्र सिंह की डिमांड कि खासियत है कि उन्हें मंत्री पद भी चाहिए, वो भी उनके पसंद का पोर्टफोलियो होना चाहिये. 

कहते हैं खाली हाथ आया हैं और खाली हाथ जायेगा पर सियासत में हाथ भर जाने पर ही आता है और तभी दूसरे दल में उछाल मारता है, जब वहां भी झोली भर जाती हो. सियासत का यही तमाशा इन दिनों बीजेपी के भीतर चल रहा है. कांग्रेस के बागियों का बीजेपी से उमड़ा प्यार हो या सपा-बसपा-निर्दलीय हो, सभी अंतहीन इच्छाओ का आराध्य बीजेपी को मान चुके हैं. कांग्रेस के बागी अगर उपचुनाव में फतह करते हैं तो दो क्रिकेट टीम के बराबर विधायकों की नई पौध भी मंत्री पद की दौड़ में होगी. साथ ही अभी शिव सरकार को समर्थन देने वाले अन्य दलों का कोई दिली प्रेम बीजेपी के प्रति नहीं हैं, बल्कि वो भी शर्तो का पताका लहराये हैं.


विचारधारा को लेकर वर्षो से तप कर रहा बीजेपी का असल कैडर, क्या खामोश बना रहेगा?
बीजेपी के साथ उलझन है कि अगर मंत्री पद की मलाई से भरी थाली सभी बाहरियों को परोस दी जाएगी तो विचारधारा को लेकर वर्षो से तप कर रहा बीजेपी का असल कैडर, क्या खामोश बना रहेगा. बीजेपी के मूल कैडर के सीनियर विधायकों की लम्बी सूची है, जिनका मंत्री बनने का दावा भी है और उनका हक़ भी बनता है. जैसे गोपाल भार्गव, राजेन्द्र शुक्ला बढ़े ब्राह्मण चेहरे हैं, जिन्हे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. राजेंद्र शुक्ला की दावेदारी पर उन्ही के विंध्याचल के सीधी से विधायक केदार शुक्ला ने पेंच फंसा दिया है. केदार शुक्ला ने तो ऐलान कर दिया है कि "मैं मंत्री बनूँगा'' मुख्य है कि केदार शुक्ला अपने बागी तेवर दिखाते रहे है, जिन्हे नज़रअंदाज़ किया गया तो कांग्रेस की तरह बीजेपी को आइना देखना पढ़ सकता है. 

ऑपरेशन लोटस के मुख्य किरदार पूँजीपति विधायक संजय पाठक, भूपेंद्र सिंह, अरविन्द भदौरिया को मंत्री पद से नवाजना बीजेपी की मज़बूरी है. अन्य दावेदारों में गौरीशंकर बिसेन, विजय शाह, रामपाल सिंह, यशोधरा राजे सिंधिया, विश्वास सारंग, अजय विश्नोई, पारस जैन, महेंद्र हार्डिया, ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह, गोपीलाल जाटव वो चेहरे हैं, जो शिव सरकार के पूर्व कार्यकाल में उनकी मंत्री परिषद का हिस्सा रहे हैं. पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण को भी उपकृत करना होगा. 


नए चहरे भी लगाए हैं बराबर टकटकी  
नये चेहरों की बात करें तो इनमें रमेश मैंदोला, राजेंद्र पांडे, प्रदीप लारिया, यशपाल सिंह सिसोदिया, ओमप्रकाश सखलेचा सहित आधा दर्जन अन्य वो विधायक हैं, जो कई बार चुनाव जीतने के बाद भी मंत्री पद हासिल नहीं कर सके, इस बार यह भी टकटकी लगाये बैठे हैं. महिला दावेदारों में उषा ठाकुर, नीना वर्मा, मालिनी गौंड़ को भी उम्मीद है कि इस बार उनका नंबर अवश्य आएगा.  

कहते हैं संकट आने का क्रम भी अनवरत होता है. समस्याएं चारों ओर से घेरा बनाती हैं. बीजेपी भी इन संकटों  के चक्रव्यूह में फंसी हैं. बीजेपी में कई क्षत्रप हैं, जो मप्र के हर हिस्से में अपना अपना दम रखते हैं. इन ताकतवर खेमों को साधने और मनाने के लिये उनके समर्थित विधायकों को मंत्री परिषद का हिस्सा बनाना वो चुनौती है, जिससे उबरना ओर निबटना आसान नहीं हैं. इसी पशोपेश में मंत्री मण्डल का गठन उलझ रह गया है. अभी सिर्फ झुनझुना बजाया जा रहा है, जिसे सुनकर मंत्री पद के दावेदार ख़ुश हैं कि उनका नंबर आएगा.




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