कोरोना संक्रमण को खुला निमंत्रण दे रही हैं शराब की दुकानें




कोरोनावायरस को देश से दूर हटाने के प्रयास अभी जारी ही थे कि 4 मई को शराब की दुकानें खुलने के बाद आई तस्वीरों ने एक बार फिर सभी को चिंतित और चकित कर दिया है। 4 मई को शराब की दुकानें खुलते ही शराब की दुकानों के बाहर ऐसी भीड़ उमड़ आई, मानो समुद्र मंथन के बाद अमृत घट हाथ लग गया हो। 







वह लोग जो पिछले लंबे समय से अपनी जान जोखिम में डालकर इस देश को कोरोनावायरस से बचाने में लगे हुए हैं आज शराब की दुकानों के बाहर लगी कई किलोमीटर लंबी लाइनों को देखकर एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं कि- क्या इस तरह से हम कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोक कर कोरोनावायरस को हरा पाएंगे ? 


इस भयावह महामारी के बीच सरकारों द्वारा शराब की दुकानें खोलने का यह निर्णय आखिर कितना सही है ? और कितने जायज है वह लोग भी जो एक बोतल शराब के लिए कई अपनी जान जोखिम में डाल कई किलोमीटर लंबी लाइन लगा के खड़े हुए हैं ? क्या ये करोना संक्रमण को खुला निमंत्रण नहीं है ?



सरकार द्वारा शराब के दामों में 70% की वृद्धि तो कर दी गई है किंतु उसके बावजूद भी इन लंबी कतारों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि शराब पीने वाले व्यक्तियों पर अंश मात्र भी प्रभाव पड़ा है । आज भी शराब की दुकानों के बाहर कई कई किलोमीटर लंबी लाइन लगी हुई है और लोग सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से शराब खरीद रहे हैं 

गौर करने वाली बात ये भी है कि आज से कुछ दिन पहले जब कोरोना के चलते पूरे देश में लॉकडाउन घोषित किया गया। ऑफिस बंद हो गए, लोगों के काम बंद हो गए तब लॉकडाउन के कुछ दिनों बाद ही लोगों ने अपने दुखड़े गाना शुरू कर दिया था।  किसी के पास राशन नहीं था तो किसी के पास राशन खरीदने के पैसे नहीं थे। ऐसे लोगों की कमी भी नहीं  थी जिन्होंने सरकार के इस निर्णय गलत ठहराया हो।  देश के गरीब तबके के साथ समस्या होना संभवतः यह सत्य भी हो सकता है। किंतु किसी न किसी बहाने सरकार को कोसने वाले लोगों में बड़ी मात्रा में ऐसे तथाकथित गरीब भी थे। जो सरकार से हर चीज फ्री में चाहते थे। यहां तक कि ₹10 का एक सेफ्टी मास्क तक। और वही तथाकथित गरीबों की भीड़ आज शराब की दुकानों के बाहर लग रही है।

बीते दिनों 4 मई को जब देश में लोग डाउन 3.0 की शुरुआत हुई और सरकार द्वारा लॉकडाऊन में थोड़ी राहत देते हुए अनिवार्य चीजों को खोलने निर्णय लिया गया। तब शराब की दुकानों के बाहर लगी कई किलोमीटर लंबी लाइनों में ऐसे लोग भी थे जो अब तक चीख - चीख कर बिलक बिलक कर कह रहे थे कि हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं है। वही लोग जो कल तक राशन की दुकानों पर खड़े नजर आ रहे थे। वही लोग आज शराब की दुकानों के बाहर लंबी कतार लगाए खड़े हुए हैं।



तब यह प्रश्न उठाना बेहद जरूरी है कि यदि कल तक लोगों के पास दो वक्त की रोटी खाने भर के भी पैसे नहीं थे तब आज शराब खरीदने के पैसे कहां से आ गए। आज जब शराब के दामों में 70%  तक की बढ़ोतरी कर दी गई है। उसके बाद भी 4 मई को शराब की दुकानें खुलने के पर आर्थिक संकट से जूझ रहे देश में 700 करोड़ का शराब कारोबार हो गया। आखिर कैसे ? 

प्रश्न तो यह भी उठता है कि क्या सरकार की नजरों में शराब की दुकान खोलना आवश्यक था? यदि नहीं तो फिर ऐसा क्यों किया गया। 
अब यदि तर्क ये दिया जाए कि इन कई किलोमीटर लंबी लाइनों में गरीब नहीं है। तब आपको स्वयं इस बात पर विचार करना चाहिए। क्योंकि लॉक डाऊन के दौरान भी कई कई बार बीड़ी सिगरेट और तंबाकू के लिए दुकानों पर लगने वाले हुजूम की तस्वीर सामने आती रही है। जिनमें अमीर और गरीब दोनों ही शामिल थे।

यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि किस तरह लॉक डाउन के दौरान चोरी-छिपे शराब खरीदने बेचने का कार्य चलता रहा है। इस बात को नकारा जा सकता है, और संभवतः नकारा भी जाए। लेकिन आज जो तस्वीरें सामने आई है इन तस्वीरों को देखने के बाद बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। 

एक ओर लॉक डाउन के दौरान जहां अपने आप को गरीब और असहाय दिखाकर सरकार से मदद प्राप्त की होड़ लगी थी वहीं अब नियमों की धज्जियां उड़ाने हुई कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

आज शराब की दुकानों के बाहर खड़े लोग शराब की एक बोतल के लिए न केवल अपनी बल्कि अपने साथ में सैकड़ों लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। यदि ऐसे स्थानों से संक्रमण फैला तब क्या इसे रोक पाना संभव होगा ? क्या इस तरह से हम कोरोनावायरस को हरा पाएंगे ? आज जब पूरी दुनिया पूरी मानव जाति इस महामारी से ग्रस्त है लाखों लोग इस महामारी के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं। उस वक्त देश की जनता द्वारा की जा रही ये नासमझी, देश को एक बड़े संकट में डाल सकती है और इस सब के लिए जितनी जिम्मेदार यह जनता होगी, उतनी ही जिम्मेदार सरकारें भी होंगी। 

आखिर क्यों ? क्यों तेजी से फैल रही इस महामारी के खतरे के बावजूद सरकार द्वारा शराब की दुकानों को खोलने की इजाजत दी गई ? क्या केन्द्र और राज्य की सरकारें यह नहीं जानती कि इस तरह लगने वाली भीड़ से कोरोना तेजी से फैल सकता है। और यदि बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सुधारने के लिए यह सब इतना ज्यादा ही आवश्यक था, तो इसके बेहतर इंतजाम क्यों नहीं किए गए ? क्या शराब को 70 महंगा कर देना मात्र ही काफी था ? या ठेके शराब के ठेकों के बाहर सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर गोल घेरे खींच देना भर काफी था ?  निश्चित ही नहीं।

वो सोशल डिस्टेंस इन जिसे कोरोना के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बताया जा रहा था। आज उसी सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाई जा रही है और इसका परिणाम यह हुआ कि शराब की दुकानें खुलने के बाद जिस तेजी से कोरोना ने अपने पैर पसारे हैं उसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अकेले महाराष्ट्र में पिछले 24 घंटों में 771 नए मामले सामने आए हैं। और यह तो केवल शुरुआत मात्र है। महाराष्ट्र का अतिरिक्त भी अन्य राज्यों में पिछले 24 घंटों में करोना के मरीजों की संख्या बढ़ी है। जिसका एक बड़ा  कारण शराब की दुकानों के बाहर लगने वाली भीड़ है। यदि ये सब ऐसी तरह चलता रहा और शराब की दुकाने करोना संक्रमण को इसी तरह खुला निमंत्रण देती तो करोना से पार पाना बेहद मुस्किल भी हो सकता है।  

इस पूरे घटनाक्रम में एक ओर जहां गलत सरकार द्वारा शराब की दुकानें खोलने का निर्णय है, तो वहीं दूसरी ओर गलत वह भारी भीड़ भी है। जो इस संकट काल में भी इस तरह की लापरवाही बरत रही है। ये लापरवाही निश्चित ही कोरोना  संक्रमण को खुला निमंत्रण देने जैसा है। जो इस देश को किसी बड़े संकट के मुहँ में ढकेल सकता है।





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