'गए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास' को चरितार्थ करता सरकारी फैसला




चुटकुलेबाजी तक तो सब ठीक था, लेकिन अब इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि शराब की दुकानों को खोलने की अनुमति देना सरकारों और आम जनता, दोनों के लिए शत प्रतिशत गलत और घातक फैसला सिद्ध होगा.
- सतीश चन्द्र मिश्रा 

इसका कारण जानने से पहले इस फैसले की पृष्ठभूमि देख लीजिये. शराब की दुकानों को खोलने के फैसले का सबसे बड़ा और एकमात्र कारण हर राज्य सरकार यह बता रही है कि आज तेजी से घटता हुआ राजस्व उसकी सबसे बड़ी समस्या है और शराब की बिक्री राजस्व प्राप्ति का मुख्य स्त्रोत है. राज्य सरकारों का यह कथन सही भी है. लेकिन जिस क़ीमत पर वो इस राजस्व को प्राप्त करना चाह रहीं हैं, वह क़ीमत उनके लिए बहुत बड़ी और भयानक भी सिद्ध हो सकती है. राज्य सरकारों का यह फैसला उनके लिए "गए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास" सरीखा ना सिद्ध हो. बेहतर होगा कि अभी कम से कम एक माह शराब की दुकानों को बंद रखा जाए. इसके बाद जब यह दुकानें खोली जाएं तो उन पर 25 से 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त कर लगा कर राज्य सरकारें इन दो महीने के दौरान हुए राजस्व की हानि की पूर्ति कर सकती हैं.


राज्य सरकारें यह ध्यान रखें कि आज राजस्व प्राप्ति के लोभ में शराब की दुकानों को खोलने की उनकी अनुमति अगले कुछ दिनों में कहर बरसा सकती है. दुकानों के आगे कल उमड़ी भीड़ बड़ा मुद्दा नहीं है, क्योंकि कल 40 दिन बाद दुकानें खुली थीं, इसलिए भीड़ ज्यादा हो गई, यह स्वाभाविक भी था. एक दो दिन में यह भीड़ गायब हो जाएगी. एक दो दिन के बाद इन दुकानों पर उतने ही लोग दिखेंगे जितने समान्य स्थिति में पहले दिखते थे. लेकिन बड़ी समस्या वह ऊधम उत्पन्न करेगा जो शराब पीने के बाद ये लोग करेंगे.

शराब पीने के बाद ये लोग अनुशासित रहेंगे, लॉकडाउन के निगमों का पालन करेंगे. ऐसा सोचना मूर्खों के स्वर्ग में जीने की तरह है. मेरा अपना अनुभव यह है कि शराब पीने वालों में से मुश्किल से 30-35 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जिनका पीने के बाद स्वयं पर नियन्त्रण रहता है और वो शांत रहते हैं. शेष 65-70 प्रतिशत लोगों का पीने के बाद स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रह जाता है. उनमें से आधे लोग हिंसा या उपद्रव भले ना करें लेकिन अपनी उलूल जलूल हरकतों करतूतों से अपने घरवालों, पास पड़ोस वालों के लिए समस्या बन जाते हैं. शेष आधे लोगों को शराब पीने का आनंद ही तब मिलता है जब वो बवाल कर लेते हैं.

कोरोना संक्रमण के अति संवेदनशील वातावरण में यही 65-70 प्रतिशत शराबी, विशेषकर बवाली प्रजाति के शराबी आने वाले दिनों में अपने अगल बगल के वातावरण तथा पुलिस बल के लिए बड़ा सिरदर्द बनेंगे. ऐसे लोगों की संख्या सैकड़ों या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में होगी. कामधाम से पूरी तरह छुट्टी पाकर खाली बैठे ये शराबी अपने मोहल्लों और कालोनियों में शांति से रह रहे लोगों का जीना हराम कर देंगे. समान्य दिनों में ऐसे लोग रोजी रोटी के जुगाड़ सहित कई बातों में व्यस्त रहते हैं लेकिन लॉकडाउन की वर्तमान स्थितियों में ये बिल्कुल खाली बैठे हैं. खाली दिमाग को शैतान का घर भी कहा गया है, कोरोना से मौत का डर अभी तक उस शैतान पर भारी पड़ा है. लेकिन अब उस डर को शराब खत्म करेगी. यह स्थिति बहुत शुभ नहीं होगी.

आजकल कोरोना वायरस संक्रमण पर नियन्त्रण के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरी तन्मयता तत्परता से सम्भाल रही पुलिस के समक्ष इन शराबियों का उपद्रव कानून व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी समस्या उत्पन्न करेगा. मैं आज यह बात यूं ही नहीं कह रहा हूं. शराब की दुकानें कल ही खुलीं और कल से ही ऐसे उदाहरण सामने आने लगे हैं. लखीमपुर जनपद में एक शराबी द्बारा किए गए शराब के तांडव का वीडियो देखिए, शराब की दुकानें यूं ही खुलीं तो ऐसे कई वीडियो आपके सामने आने वाले हैं, कहा जा सकता है.  




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