“मीरा याज्ञिक की डायरी” लगा कि मैं ही बगल में एक फ़ाइल दबाये, एक विभाग से दूसरे और दूसरे से तीसरे में भाग रही हूँ



‘विश्वगाथा’ का अप्रैल–जून 2020 अंक पढने का सौभाग्य मिला, प्रसन्नता हुई. अधिक प्रसन्नता इस बात की कि पत्रिका विशेषांक के साथ अपनी विशिष्ट पहचान बनकर निकली है.



समीक्षा / रचना दीक्षित

बात करते हैं बिन्दु बेन की कृति “मीरा याज्ञिक की डायरी” की, जिसे मैं एक साँस में पढ़ गयी. एक बात कहूँ, जैसे ही डायरी की एक या दो लाइन पढ़ती थी, तो दिमाग में एक हजार लाइनें चल पड़ती थीं. इसके पहले कि कुछ और कहूँ मैं पहले अपने कुछ व्यक्तिगत विचार रखना चाहती हूँ. पहली बात मैंने भी रिसर्च वर्क किया है, जानती हूँ इसका क्या मायाजाल है.... जैसे आजकल लॉकडाउन में लगता है कि जीवन बस इसी लॉक डाउन में ही बीत जायेगा. तब भी यही लगता था, लेबोरेट्री और लाइब्रेरी से इतर दुनिया ही नहीं है. दूसरी बात मैं लखनऊ में पली, बढ़ी, पढ़ी और हिंदीभाषी हूँ; मुझे मेरे हिंदीभाषी होने पर बहुत गर्व भी है. परन्तु मेरे जीवन के बहुमूल्य साल शायद 15 या 16 साल गुजरात में बीते, अतएव मेरे शरीर के बहुत सारे प्रदेशों (अंगों) में बहुत सारा गुजरात बसता है और इस पर भी मुझे गर्व है. 


जब-जब जहाँ-जहाँ मीरा गयी या किसी जगह का नाम मात्र आया, मैं भी उसके पीछे-पीछे ही गयी फिर चाहे अम्बाजी, गब्बर हो, माउन्ट आबू, साबरमती, तीन दरवाज़ा या दयानंद प्रिंट की साड़ी ही क्यों न हो. तीसरी बात मैं ने गुजरात में शिक्षण कार्य भी किया है. मेरे वो बीएससी के विद्यार्थी, लेबोरेट्री, विश्वविद्यालय के चक्कर, सबमें घूमती हुई, यूँ लगा लखनऊ की भूल भुलैया में कहीं खो गयी हूँ.


सच पूछिए तो उपन्यास के सभी आम परिदृश्यों में कोई भी अपने आपको सहज ही जोड़ लेगा. मुझे भी पढ़ते समय ऐसा लगा कि मैं ही बगल में एक फ़ाइल दबाये, एक विभाग से दूसरे और दूसरे से तीसरे में भाग रही हूँ. हर गतिविधि और हर प्रतिस्पर्धा में यहाँ तक की लम्बे बालों वाली प्रतिस्पर्धा में, क्योंकि मैं भी ये प्रतिस्पर्धा जीत चुकी हूँ. अब आप स्वतः ही समझ गये होंगे, कि ये डायरी कितने करीब से गुजरी और कितने ही बंद किवाड़ और कोठरियों को खंगालती हुई गुजरी.

चूँकि नायिका एक बीमारी से ग्रसित है और शायद लेखिका भी, दोनों की पढाई और शोध, सब कुछ एक जैसा ही तो है. यूँ लगता है कि डायरी के हर शब्द में बिन्दु भट्ट जी ने अपने आपको रख दिया है निचोड़ कर. इस बीमारी के कारण जो एक हीन भावना दिल और दिमाग में घर कर गयी है उसे निकालना आसान नहीं है. या यूँ कहें कि जीवन में हर एक इन्सान किसी न किसी हीन भावना से ग्रसित होता है, पर ये जो चेहरे और शरीर पर दूर से दिखने वाली होती है, ये अधिक दुःखदाई है. न चाहते हुए भी हर कोई इसे पढ़ लेता है, आमतौर पर इस हीन भावना से उबरने के लिए लोग जो कुछ करते हैं वो उनकी हीन भावना को और अधिक उजागर करता है. यहाँ पर ऐसा कुछ खास नहीं दिखा, क्योंकि चितकबरी नायिका पढने में अव्वल है जो उसे संबल देता है. उसके जीवन में जो कुछ भी अप्रत्याशित घटित हुआ, उसमें उसका अपना प्रयास न के बराबर था; वो तो बस होता गया और वो पात्र बनती गयी. उसकी माँ जो त्यक्ता है, शांत दिखती है मानो दिमाग में सब कुछ साफ़ है, जीवन में क्या करना है क्या नहीं. शायद अपने जीवन से जो अच्छा बुरा अनुभव पाया है उसका नतीजा है या परिपक्वता है. 

बेटी की बीमारी और उससे उपजे सामाजिक बहिष्कार को भली भांति जानती है, हर माँ की तरह दु:खी है पर ऊपर से अपने आपको सुखी और निश्चिन्त दिखाती है. तभी तो मीरा तीन दिन से नींद की गोली खा कर एक ही कमरे में बंद है, मम्मी कुछ भी नहीं बोलती, क्या बोले वो भी... . 


बिन्दु भट्ट जी को प्रकृति, रँग और सुगंध से कितना प्रेम है; वो सरसों के खेत, माँ की गुलाबी साड़ी, नदी का कभी शांत, कभी उफान पर होना, समुद्र की हलचल, शिरीष के फूल, कमरे की खिड़की तक लटकती डाली, हर एक बात बरबस ही खीँच लेती है अपनी ओर. वृंदा का व्यवहार बस अपने मतलब भर का ही था. वो तलाश कर रही थी किसी ऐसे साथी की, जिसके साथ जीवन आराम से जी सके, जो उसे डॉक्टर अजीत के रूप में मिल गया शायद कमानी साहब उसे वो स्थिरता नहीं दे सकते थे, बीबी बच्चों वाले जो थे. 
डॉक्टर अजीत डाइवोर्सी थे, बीच के समय में उसने मीरा का उपयोग और उपभोग किया. उसमें एक चाह जगाई, एक प्यास बढ़ाई या यूँ कहें एक नयी प्यास को जन्म दिया रास्ता दिखाया और मंझधार में छोड़ दिया. जब कवि उजास से मिली, फिर एक आस जगी थी. वो विधुर था एक बेटी का पिता था तभी तो मीरा ने चौकीदार के पूछने पर बड़े अधिकार से कहा कि मेरा वर है. कितनी उम्मीद बंधी होगी, तभी कहा होगा.... . उपन्यास का अंत ही इसे भीड़ से अलग करता है ये निश्चय ही अलग है, अंत किसी पर थोपा नहीं गया है पाठक स्वयं ही सोच लें कि उसे वो मीरा किस रूप में देखनी है.

शादीशुदा... सुखी / दु:खी
बिना शादी के... सुखी / दु:खी

पर ये सच है कि उसकी हर चढ़ती उतरती साँस के साथ पाठक की भी साँसें चढ़ती उतरती है. निश्चय ही इस उपन्यास में लेखिका नारी मन की वेदनाओं और संवेदनाओं को एक अलग ही दृष्टि से देखने और दिखाने में सफल रही है है, जिस दृष्टि से शायद कोई देख ही नहीं पाया.

सोचती हूँ और समझने का प्रयास कर रही हूँ क्या मीरा नाम के साथ ही जीवन भर की प्यास जुड़ी होती है...... . अपनी बात अपनी एक कविता के माध्यम से रख कर समाप्त करना चाहती हूँ -

“कितने जन्म और लूँ मैं, कब तक मौन सहूँ मैं
वाद, विवाद, संवाद, प्रतिवाद, अपवाद वही
वेदना, संवेदना, भेदना, कुरेदना वही
तहरीर, तकरीर, तह्कीर, तदवीर वही
पीर, तक़दीर, तस्वीर वही
बदला है कुछ तो बस एक किरदार
पिछला जन्म पति और प्रताड़ना
वर्तमान पिता और प्रताड़ना
क्या अग...ला... जन्म?
पुत्र औ...?
प्रपौत्र औ...?”




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1 comments:

  1. मेरे द्वारा लिखी गयी "मीरा याज्ञिक की डायरी" की समीक्षा को अपने वेब पोर्टल पर स्थान दे कर सम्मानित करने के लिए श्री मुकुट सक्सेना जी की बहुत बहुत आभार ।

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