वट सावित्री पूजा इसी पेड़ के नीचे क्यों?




लेकिन मेरा व्रत न करना साहेब जी को बुरा लगने लगा. सुबह इनकी बातों से लगा कि मेरा व्रत न करना कहीं इनकी उम्र . . 

वट सावित्री कथा की यह व्यथा
ये पूजा इसी पेड़ के नीचे क्यों होती है? सत्यवान बरगद के पेड़ के नीचे ही आराम किये थे इसलिए या बरगद चौबीस घण्टा ऑक्सिजन देता है. और फिर.. हम भी औरों की तरह चुपचाप कथा सुन, दक्षिणा दे, वापस घर निकल लिए..



उषालाल सिंह 


वट सावित्री पूजा स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए करती हैं. पहले भी गांव में होता था, पर इतनी संख्या में नहीं. 
मेरी माँ यह पूजा नहीं करती थी,न ससुराल में जेठानी, इसलिए हम भी नहीं. 
पर कुछ वर्षों से जेठानी यह व्रत शुरू की. 
पिछले साल संयोगवश अपने ससुराल (अरवल) आई थी. तब उन्होंने मुझे भी करने को कहा. पूजा पाठ के प्रति मेरा विशेष लगाव तो नहीं रहा, फिर भी तीज, जितिया, शिवरात्रि कर ही लेती हूँ. 
पिछले साल की यादें आज भी ताजा हैं. 

पटना अकेले के कारण या ऐसे भी इस बार मन नहीं था. 
108 बार बरगद का चक्कर लगाना बहुत थका देता है या पता नहीं मुझे दिक्कत है, क्योंकि नंगे पैर चलने में एक कंकड़ भी जान निकाल देता है. बस इस बार निश्चिन्त थे कि कुछ न करना है, पर मेरे चाहने से क्या?
परसों शाम में ही जेठानी फोन कीं. . 
"सुन न 22 तारीख के सावित्री पूजा हई, घरे आ जईह"
कल दिन भर घर के कामों में व्यस्त रही. एक मन किया शाम में घर चले जाएं. फिर सोचे कि परेशानी व खर्च दोनों है. बस शांत रहें, लेकिन मेरा व्रत न करना साहेब जी को बुरा लगने लगा. 

सुबह इनकी बातों से लगा कि मेरा व्रत न करना कहीं इनकी उम्र . . . 
यदि मेरे व्रत रखने से इनको सन्तुष्टि मिलती है, तब साल में एक बार क्या साल के बारहों महीना में व्रत रखूँ. 
अकेले करने से अच्छा गांव आना ही ठीक लगा. बिना तैयारी न नए कपड़े, न कोई खरीदारी बस गांव आ गयें. पर दीदी(जेठानी) को जैसे मेरा इंतजार था. मेरे लिए पूजा की सारी सामग्री अलग से रखी थीं. फल, प्रसाद, धागा आदि. बस नए कपड़े की कमी थी. मेरे पास कुछ नए कपड़े थे भी तो सारे टेलर के यहाँ लॉकडाउन 

साड़ी की कमी भी ये पूरी कर दिये. तुरन्त ही बाजार से सारी चीजें उठा लाएं. 
दीदी को हम पहले ही बोल दिये कि हमसे 108 बार न घुमा जाएगा. तब मेरे लिए बादाम, किशमिश के 21, 21 दाने गिनकर अलग किये गए. 
ये करते दोपहर के 12 बज गए. 

दीदी पूजा कर चुकी थीं. 
क्योंकि एकलौता बरगद प्रखंड परिसर में है. जहाँ प्रशासन की कड़ी हिदायत है भीड़ इकट्ठा न करने की. किसी ने कह दिया सी सी टीवी लगा हुआ है. 
ऐसे में गांव घर की महिलाएं एक अनजानी भय से कि
बाप रे !
सी सी कैमरा लगल हई..
हमनी राते में सब लोग पूजा कर लिह. 

बस रात एक बजे से ही आस पास की सब महिलाएं पूजा को अंजाम देने जा पहुंची. 
दोपहर होने की वजह से मुझे यह फायदा हुआ कि भीड़ छंट चुकी थी. गिने चुने दो चार महिलाएं ही मिली. बड़े आराम से पूजा की. न इस बार मेरे धागे किसी और के धागे से उलझे न ही टूटे. निर्विघ्न पूजा फेरी के बाद कथा सुनने बैठे. तभी प्रशासन की गाड़ी आई. जेठानी के साथ ही अन्य महिलाएं झटके से एकतरफ हो गई. . 

गाड़ी से एक महानुभव उतरे. अब गाड़ी से उतरे हैं तो स्वभाविक है पदाधिकारी ही होंगे. हाथ में फ़ाइल, चेहरे पर मास्क, और रोबीला चाल. खैर मुझे क्या?
पर वो गाड़ी से उतर कर कथावाचक पंडित जी की ओर मुखातिब हो बोले. . 
"ये पूजा इसी पेड़ के नीचे क्यों हो रही है?"
आस पास और भी तो पेड़ हैं.
पंडित जी अब डर से या कुछ और.. पर हड़बड़ा गये. 
जी सर अपने ही बता दीं 
वो महाशय का ध्यान दरअसल उन दो महिलाओं पर था, जो काफी खूबसूरत व नई ब्याहता मालूम हो रही थी. 

पंडित जी की बातों से बेअसर
पुनः वही सवाल, पर नजरें उन दो महिलाओं पर. 
इस बार मैं बोली (आज तक ससुराल में ऐसे बाहर किसी अजनबी से मेरा कभी कोई संवाद न हुआ है ) 
कि सत्यवान बरगद के पेड़ के नीचे ही आराम किये थे. 
वो सन्तुष्ट न हुए... 

फिर उन्होंने कहा. . 
बरगद चौबीस घण्टा ऑक्सिजन देता है. 
मैं फिर बोल पड़ी. . . . 
नहीं सर, गलत बोल रहें है. 
पीपल, नीम, तुलसी चौबीस घण्टा ऑक्सीजन देता है. 
मेरे से प्रत्युत्तर को वे तैयार न थे. न ही ऐसे जवाब की उन्हें सम्भावना थी. 
उनकी सकपकाहट चेहरे पर साफ दिखी . 

फिर बोले नहीं बरगद देता है. 
अब मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. 
ऐसा लगा मैं अपने क्लास रूम में हूँ और सामने बच्चा गलत बात पर बहस कर रहा है. 
अब मेरा स्वर तेज था. 
सर मेरा सब्जेक्ट बॉटनी है. आप ऐसे कैसे बोल सकते हैं. मेरी बात जब तक पूरी होती महाशय गाड़ी में घुसकर फरार हो लिए. 
अब महिलाएं और पंडित जी में बड़ा सन्तोष दिखा. 
अब शांति से कथा सुनी. पंडित जी आधी रात से कथा दुहराते दुहराते थक चुके थे. ये उनकी शब्दों की लड़खड़ाहट से समझ आ रही थी. 
हम भी औरों की तरह चुपचाप कथा सुन, दक्षिणा दे, वापस घर आएं. . 
इति श्री सावित्री व्रत व्यथा 





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