भाजपा में जाने की अटकलों पर सत्यव्रत वचन 'सब बकवास, सिरफिरों की उपज, कांग्रेस में पैदा हुआ हूं, कांग्रेस में ही मरुंगा'


  Madhya Pradesh Congress Removes Satyavrat Chaturvedi As Chief ...

भाजपा में शामिल होने की अटकलों का पुरजोर खंडन करते हुये पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं कांग्रेस का स्तम्भ कहे जाने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा है कि इस तरह की खबरें सिरफिरों की उपज हैं। वह आजन्म कांग्रेसी हैं और रहेंगे। सत्यव्रत चतुर्वेदी ने यह बात हमारे संवाददाता पत्रकार धीरज चतुर्वेदी से बातचीत के दौरान कही है।


छतरपुर /धीरज चतुर्वेदी

मध्यप्रदेश में पिछले चार रोज से सियासी तूफान वाली खबरे हर जुबान पर थी कि कांग्रेस के स्तंभ सत्यव्रत चतुर्वेदी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी और पूर्व विपक्ष नेता सत्यदेव कटारे के पुत्र हेंमत कटारे आने वाले दिनो में भाजपा का फूल हाथ में थाम सकते है। खबर राजनीति के चौबारे में चौकाने वाली जैसी थी लेकिन सत्यव्रत चतुर्वेदी ने बातचीत के दौरान इस तरह की खबरो को शुद्ध रूप से बकवास बताया है। उन्होने कहा कि इस तरह की खबरे सिरफिरो के दिमाग की उपज है। पूरजोर खंडन करते हुये सत्यव्रत चतुर्वेेदी ने बताया कि वे राजनीति से सन्यास ले चुके है तो इस तरह की अटकले औचित्यहीन है। 


उन्होने कहा कि वह आजन्म कांग्रेसी थे और रहेगे। श्री चतुर्वेदी ने कहा कि जब भाजपा उनके पुत्र को टिकिट देना चाहती थी तब वह भाजपा में नही गये। जिसे जो शक करना हो वो करे, पर एक बार जो जुबान दे दी और जो कह दिया तो वह कह दिया। जन्म से कांग्रेसी हूं और रहूंगा। श्री चतुर्वेदी ने कहा कि कांग्रेस में कोई बचे या ना बचे पर सत्यव्रत बचेगा। कांग्रेस की केन्द्र की राजनीति में शिखर तक पंहुचने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी के साफगोई बयानों से कई सियासी सवाल पैदा होने शुरू हो चुके है। क्या इस तरह की खबरे भ्रमजाल की तरह सियासी फायदे के लिये कहीं से उडवाई जा रही है। ताकि मध्यप्रदेश में उपचुनाव के पूर्व कांग्रेस की अंदरूनी सतह पर हलचल से खलबली का दौर शुरू हो जाये। 

गौरतलब है कि मप्र की सरकार को तय करने वाले उपचुनाव को लेकर करोना वायरस के दौर में भी कुर्सी बचाने और कुर्सी से बेदखली का तानाबाना बुना जाने लगा है। भाजपा किसी भी चुनाव वक्त एक माहौल उपजाती रही है। जिसके राजनैतिक बहाव में दूसरे दलो के नेताओ अर्थात गैरो को अपना बनाना पहली रणनीति का हिस्सा होता है। कबूतरबाजी और राजनैतिकबाजी में कुछ ज्यादा अंतर नही है। कबूतर उडान भरता है लेकिन किसी को नही पता कि कबूतरबाजी में जीतेगा कौन। उडान तो दो कबूतरो की है और दोनो के ही मालिको ने कबूतरो को अच्छा दाना पानी देकर मजबूत बनाया है। कौन हारेगा और कौन जीतेगा यह तो समय पर और ताकत पर निर्भर है। कबूतरबाजी में उडान भराने से पूर्व दम भरा जाता है। भय और डर दिखाया जाता है जिससे विपक्षी उडान भरने से पहले ही पराजय स्वीकार कर ले। मध्यप्रदेश में सरकार की स्थिरता को तय करने वाले 24 सीटो पर उपचुनाव होना है। यानि कबूतरबाजी की उडान पूर्व रणनीति तैयार की जा रही है।  


इस बार तो जिन 22 क्षेत्रो में उपचुनाव होना है, वो सभी कांग्रेसी सत्ता से जुडे थे लेकिन कबूतरबाजी के परिपक्व मुख्य कप्तान सहित उनके सभी विधायक भी अपना घर छोड गये और हाथ में कमल का फूल थाम लिया। अब घर छोडने वाले या कहे कि कांग्रेस के बागियो की रिक्त सीट पर चुनाव होना है। तो भाजपा ने फिर अपनी गैरो को अपनाने वाली राजनीति का मुख्य दरवाजा खोल दिया है। दो रोज पूर्व आवभगत के साथ करोना वायरस की मर्यादाओ को लांघते हुये जिस तरह कांग्रेस के बागी मंत्री प्रभुराम चौधरी के पुत्रो को कमल का साथ दिलवाया गया वो ऐपीसोड इतना महत्वपूर्ण नही था जितना प्रचारित और प्रसारित कराया गया। यह भाजपा का एक गेम प्लान होता है जिसमे माहौल बनता रहे है और विपक्षियो में कमजोर होने का बोध होते हुये आमजनता में माहौल बने। 

अब भाजपा की इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है कि सोशल मीडिया सहित राजनैतिक हल्को में ऊहापोह के हालात इस खबर से बने कि कांग्रेस का स्तंभं कहे जाने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी, सुरेश पचौरी सहित दिवंगत सत्यदेव कटारे के पुत्र पूर्व विधायक हेंमत कटारे का कांग्रेस से मोह भंग हो चुका है। यह सभी आने वाले दिनो में हाथ में ही भाजपा का फूल थाम सकते है। क्या राजनैतिक हल्को में हंगामा मचा देने वाली यह खबर का असली हथकंडा क्या है, इसका सच जानने के लिये सभी आतुर होंगे। अतीत में जाना होंगा सच समझने और हकीकत को आत्मसात करने के लिये। याद करे कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सत्ता थी और दिग्विजय सिंह का शासन था। तब उस कार्यकाल में सत्यव्रत चतुर्वेदी मध्यप्रदेश  शासन में मंत्री थे। 


अपने ही मुख्यमंत्री से प्रताडित होने का आरोप लगा सत्यव्रत चतुर्वेदी ने 4 अगस्त 1997 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। यह एक पीडा थी लेकिन उन्होने तब भी कांग्रेस छोडने से अच्छा राजनीति की सक्रियता से सन्यास लेना उचित समझा था। समय का फेर है कि उसके बाद ही सत्यव्रत चतुर्वेदी ने लोकसभा चुनावा जीता और वो कांग्रेस में लोकसभा के मुख्य सचेतक के रूप मे उभरे। कांग्रेस हाईकमान के करीबियो में वो गिने जाने लगे। समय पलटा तो उनका पुत्र पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से छतरपुर जिले कि राजनगर विधानसभा से प्रत्याशी रूप मे चुनावी समर में उतरा जो पराजय हो गया। 

एक वाक्या याद है इस चुनाव का,  मंच पर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव थे और सत्यव्रत चतुर्वेदी भी मंच पर मौजूद थे लेकिन मंच पर दिये गये भाषण  ने सनसनी फैला दी थी जब सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि वह कांग्रेसी थे और रहेगे। आज स्वयं सत्यव्रत चतुर्वेदी ने खुलासा कर दिया कि उनके पुत्र को भाजपा टिकिट देना चाहती थी अर्थात तब भी भाजपा ने सत्यव्रत पर डोरे डालने की कोशिश की थी, जो भी यह सियासी गणित है जिसमें शह  मात के खेल के लिये हर मापदंडो को खरा और उचित माना जाता है। कांग्रेस के दिग्गजो का भाजपा में जाने की उडती खबरे भी महज अफवाह और माहौल बनाने की सियासी साजिश है, सवाल तो है और रहेगा



Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a comment

abc abc