आम आदमी का विश्वास खो रही आज की पत्रकारिता



हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष 

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आज पत्रकारिता के क्षेत्र में पक्षपात की भावना पैदा हो चुकी है, जिसके कारण आज समाज वास्तविकता से अंजान हो रहा है. अनुच्छेद 19 में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया, लेकिन आज कहीं न कहीं लोक तंत्र का चौथा स्तम्भ अपने मानकों से पीछे हट रहा है. महात्मा गांधी ने मीडिया को लोकतंत्र व समाज का दर्पण कहा, क्यूँ कि मीडिया ही वो स्तम्भ है, जो समाज को सच व निष्पक्षता से रूबरू कराती है, लेकिन आज स्थिति अलग है.  


आकाश निगम 

अटल बिहारी बाजपेयी ने एक सेमिनार में कहा था कि जिस तरह लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अहम है, उसी तरह मीडिया का स्थान भी लोकतंत्र में बहुत ही अहम है क्यूँ कि वो मीडिया ही है जो सत्तापक्ष से किसी भी बिषय पर बिना डरे हुए , बिना रुके हुए सवाल पर सवाल करती रहती है और समाज को वास्तविकता से परिचय कराती है, लेकिन अगर आज आप पत्रकारिता को नजदीक से देखें तो उसमें पक्षपात की भावना जागृत हो चुकी है. आज कुछ हिंदी न्यूज़ चैनल व हिंदी पत्रकारिता के अच्छे पत्रकार सत्तापक्ष के पक्ष में ही बोलते रहते हैं, उनकी योजनाओं का गुणगान किया करते हैं, सरकार से किसी भी मुददे पर कोई सवाल नहीं पूछते हैं. सरकार की कमियों को समाज से छुपाने का प्रयास दिन रात किया करते हैं और सत्तापक्ष के आगे विपक्ष को कोई तरजीह नही देते हैं. 


और कुछ हिंदी न्यूज़ चैनल व पत्रकार सिर्फ ओ सिर्फ सत्तापक्ष की बुराई ही करते रहते हैं. वो सिर्फ विपक्ष की ही बात को तरजीह देते हैं. वो सरकार के अच्छे कार्यो तक की आलोचना करते रहते हैं, यहाँ तक कि सरकार के विरोध में कभी कभी देश विरोधी बाते भी कर जाते हैं. संसद में बजट पेश होता है तो कुछ न्यूज़ चैनल वालों को बजट में एक भी कमी नही मिलती, जब कि कुछ न्यूज़ चैनल को उसमें एक अच्छाई नहीं मिलती. जब बजट आया है तो जाहिर है उसमें कुछ वर्गों का फायदा होगा तो कुछ वर्गों के आशानुरूप बजट नहीं पेश हुआ होगा, तो इसमें तो पत्रकारिता को सच बताना चाहिए, लेकिन वो पक्षपात की बात करते रहते हैं. 

आज कोरोना की महामारी से पूरा विश्व संघर्ष कर रहा है, पूरा विश्व संकटग्रस्त है, भारत में प्रवासी मजदूरों का पलायन हो रहा है. इतने कठिन समय में भी कुछ न्यूज़ चैनल प्रवासी मजदुर भाइयों की समस्याओं को नहीं उठा पा रहे है, मजदूरो से जुड़े बिषयों पर सरकार से सवाल नहीं पूछ पा रहे हैं, लेकिन कुछ न्यूज़ चैनल इतने संकट के समय में सरकार की ही बुराई कर रहे हैं उन न्यूज़ चैनल को ये नहीं दिखता कि देश की सरकार कितनी अच्छी तरीके से कोरोना से निपट रही है और जब देश की आबादी 135 करोड़ हो तब, लेकिन उन पक्षपात न्यूज़ चैनल एक ही मन्त्र है वो है सरकार की आलोचना. क्या अच्छे व स्वस्थ लोकतंत्र के लिए इतनी पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता सही है, लेकिन जब से पत्रकारिता के अंदर पक्षपात की भावना जागृत हुई तब से समाज व समाज के लोग भ्रमित होने को मजबूर है, क्यूँ कि आज जनता सत्तापक्ष व विपक्ष की सच्चाई नहीं जान पा रही है. और यही कारण है कि अब लोगों का विश्वास पत्रकारिता से उठ रहा है. 

लोकतंत्र में पत्रकारिता का बहुत ही महत्व है, पत्रकारिता में पक्षपात की भावना से लोकतंत्र कमजोर हो जायेगा. इसलिए भारत के सभी हिंदी न्यूज़ चैनल व पत्रकारों को निष्पक्ष होना पड़ेगा, वो अपनी व्यक्तिगत राय को पत्रकारिता में थोपने का कार्य ना करे, पत्रकारिता वो ही बताये जो सच हो, वो ही दिखाये जो वास्तविकता हो, और वो ही सरकार से सवाल करे जो न्यायपूर्ण हो.

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर कलम के सभी सच्चे सिपाहियों को बहुत बहुत बधाई
                             



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