पहले भी फ़ैली हैं महामारियां, जन विद्रोह पनपा और कई देशों में चली गईं सत्ताएं, यही हालात आज हैं



आश्चर्य इस बात का है कि पूरा विश्व ही महामारी की गंभीरता को आज भी उतनी गंभीरता से नहीं ले रहा, जितना कि लेना चाहिए. बजह साफ़ है कि इसमें कुछ मामले छोड़ दें तो ज्यादातर गरीब वर्ग ही पहले मारा गया और आज भी वही स्थिति है, लेकिन हाँ, इसके बाद जन विद्रोह पनपा और कई देशों में सत्ताएं चली गईं. 

लगभग 100 साल पहले और उसके 100 साल पहले, और उसके 100 साल पहले, मतलब कि हर 100 साल बाद, 1720 में प्लेग, 1820 में हैजा, 1920 में स्पैनिश फ्लू और अब 2020 में कोविड-19 महामारी, यानि कि कोरोना आता रहा है. और हर बार ऐसा ही लॉकडाउन हो चुका है.  हर बार यह बात भी सामने आई कि मांसाहार के करण यह फैला, हालांकि हर बार यह चीन से ही फैला यह साबित नहीं हो सका है, हाँ 1920 में फैले स्पैनिश फ्लू के पीछे चीन को करण अवश्य बताया गया. इसे लेकर ही विश्व युद्ध की स्थिति बनी और 1918 में पहला विश्व युद्ध हुआ और फिर यह होने लगे. आज भी वही हालात हैं. 

आश्चर्य इस बात का है कि पूरा विश्व ही महामारी की गंभीरता को आज भी उतनी गंभीरता से नहीं ले रहा, जितना कि लेना चाहिए. बजह साफ़ है कि इसमें कुछ मामले छोड़ दें तो ज्यादातर गरीब वर्ग ही पहले मारा गया और आज भी वही स्थिति है, लेकिन हाँ, इसके बाद जन विद्रोह पनपा और कई देशों में सत्ताएं चली गईं. आइये जानते हैं इन सब के बारे में और ज्यादा. आप भी अपने पास कोई जानकारी रखते हैं तो हमें शेयर कर सकते हैं, जिसे यहाँ शामिल कर लिया जाएगा. मेल करें 
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1918 में स्पैनिश फ्लू महामारी दुनिया में फ़ैली थी. इसे हमारे देश में पुराने लोग लोग 'भब्बड़' के नाम से बताते हैं, जिसमें गाँव के गाँव खाली हो गए थे, जिन्हें आज हम वीरान गाँव के रूप में जानते हैं. दुनिया में इसकी शुरुआत जनवरी 1918 में हुई थी, लेकिन भारत में यह बीमारी 29 मई 1918 को तब आई, जब पहले विश्व युद्ध से लौट रहे भारतीय सैनिकों का जहाज मुंबई बंदरगाह पर लगा था. 10 जून 1918 को बंदरगाह पर तैनात सात सिपाहियों को जुकाम की शिकायत पर अस्पताल में भर्ती करवाया गया. यह भारत में 'स्पेनिश फ्लू' का पहला मामला था. भारत में रेलगाड़ियों में सफर करने वाले यात्रियों के कारण यह मुंबई से देश के दूसरे हिस्सों में भी फैल गई. तब देश अंग्रेंजो के पराधीन था वह भारतीयों की उपेक्षा करते थे. दवाईयां विकसित नहीं हुई थी. इसके कारण हमारे देश में लगभग 2 करोड़ लोगों के मारे जाने की बात कही जाती है. 
स्पेनिश फ्लू के दौरान दुनिया के लगभग हर अस्पताल भर गए थे, यही स्थिति आज कोरोना के कारण हो गई है

ट्रेन में सवार होते समय तो लोग अच्छे-भले होते थे, लेकिन गंतव्य तक जाते-जाते मरने के कगार पर पहुंच जाते थे
जान एम. बेरी ने अपनी किताब ‘द ग्रेट इन्फ्लूएंजा : द स्टोरी ऑफ द डेडलिएस्ट पैनडेमिक इन हिस्ट्री’ में भारत में इस महामारी के फैलाव का विस्तार से ब्योरा दिया है. वे लिखते हैं कि ट्रेन में सवार होते समय तो लोग अच्छे-भले होते थे, लेकिन गंतव्य तक जाते-जाते मरने के कगार पर पहुंच जाते थे.


महात्मा गांधी की पुत्रवधू गुलाब और पोते शांति की मृत्यु भी इसी महामारी से हुई थी
साल 1918 में हिंदी के विख्यात कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी आत्मकथा ‘कुल्ली भाट’ में लिखा, ‘मैं गंगा के घाट पर खड़ा था. जहां तक नजर जाती, गंगा के पानी में इंसानों की लाशें ही लाशें दिखाई देती थीं. मेरे ससुराल से खबर आई कि मेरी पत्नी मनोहरा देवी भी चल बसी. मेरे भाई के सबसे बड़े बेटे ने भी दम तोड़ दिया. मेरे परिवार के और भी कई लोग हमेशा के लिए चले गए. लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ियां कम पड़ गई थीं. पलक झपकते ही मेरा परिवार मेरी आंखों के सामने ही खत्म हो गयाा. अखबारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे.’ इस महामारी का नाम था स्पैनिश फ्लू. महात्मा गांधी की पुत्रवधू गुलाब और पोते शांति की मृत्यु भी इसी महामारी से हुई थी. स्वयं गांधीजी भी इस जानलेवा बीमारी से बीमार पड़ गए थे. कहा जाता है कि मशहूर उपन्यासकार प्रेमचंद भी इस बीमारी से संक्रमित हुए थे.

भारत में लगभग 2 करोड़ मौतें, तब भी सरकारों ने इसे छिपाया था 
इस बीमारी से दुनियाभर में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत का अनुमान है. यह दोनों विश्वयुद्धों में हुई कुल मौतों से भी कहीं ज्यादा है. भारत में इससे लगभग 2 करोड़ लोग मारे गए. भारत में हालात इसलिए खराब हुए क्योंकि इसी समय यहां अकाल पड़ा था, जिससे लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो चुकी थी. इस दौरान भारत में आर्थिक विकास शून्य से कहीं नीचे माइनस 10.8 फीसदी तक जा चुकी थी. शुरू में जब यह बीमारी फैली तो दुनिया भर की सरकारों ने इसे इसलिए छिपाया, क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों का मनोबल गिर जाएगा. सो मरने वालों की संख्या कम करके बताई गई.

इसलिए पड़ा स्पेनिश फ्लू नाम
सबसे पहले स्पेन ने इस बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया. इसीलिए इसे स्पेनिश फ्लू का नाम दिया गया. इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर पीड़ित के फेफड़ों पर पड़ता था. उसे असहनीय खांसी हो जाती थी और कभी-कभी नाक व कान से खून बहने लगता था. शरीर में भयंकर दर्द होता था. भारत में मार्च 1920 तक इस पर नियंत्रण पाना संभव हो सका. दुनिया भर में दिसंबर 1920 में इसका खात्मा हुआ.
ऑफिस में काम करने वाले लोग भी कुछ इस तरह दिखाई देते थे चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य था, ताकि इस वायरस से जान बचाई जा सके
तब देश अंग्रेंजो के पराधीन था वह भारतीयों की उपेक्षा करते थे. दवाईयां विकसित नहीं हुई थी. अतः माना गया कि मरने वालों की संख्या कम करके बताई जाए. असहाय लोग बेखबरी में मरे. लोग आज भी असहाय हो गए हैं. ऐसा माना जाता है कि भारत में स्पनिश फ्लू के कारण तब सबसे ज्यादा लोग मरे थे व देश की पांच फीसदी जनसंख्या मर गई थी. इसे स्पेनिश फ्लू इसलिए कहते हैं क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद घर लौटे सैनिको के कारण सपेन में यह फ्लू सबसे पहले फैला. अपने यहा जहाजों से मुंबई बंदरगाह पर पहुंचने के कारण इसे मुंबई फ्लू भी कहा जाने लगा था. मजेदार तथ्य है कि स्पेनिश फ्लू स्पेन से नहीं फैला था. तथ्य है कि तब एंटीबायोटिक व बैक्टिरियां की खोज नहीं हुई थी.
स्पेनिश फ्लू के दौरान हवा को जहरीला और जानलेवा घोषित कर दिया गया था, रईस लोग कुछ इस तरह साफ़ हवा लेते थे 


पृथ्वी की एक तिहाई जनसंख्या इसके कारण मारी गई थी
ध्यान रहे कि इसके फैलने के 10 साल बाद पेनिसिलिन की खोज हुई थी. 1928 में प्रो. एलेक्जेंडर फ्लेमिंग नामक बैक्टीरियोलॉजी के अध्यापक ने पेनिसिलिन की खोज की. प्रथम विश्व युद्ध में 1.60 करोड़ लोग मारे गए थे, जबकि स्पेनिश फ्लू के कारण दुनिया में 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. पृथ्वी की एक तिहाई जनसंख्या इसके कारण मारी गई थी. तब भी इसके लिए चीनियों को उत्तरदायी ठहराया गया था व कहते हैं कि तब एक दरवाजा बंद गाड़ी में चीनी मजदूरो को कनाडा भेजे जाने के कारण यह रोग फैला था. इसके अलावा सैनिको के लिए जो सुअरो का मांस खरीदा जाता था, उसके कारण भी यह तेजी से फैला.

अकाल के कारण लोगों को दोनों वक्त खाना तक मिलना मुश्किल हो गया
इसके कारण भारत का स्वतंत्रता संघर्ष ही बदल गया. महात्मा गांधी व गुजरात में उनके आश्रम में रहने वाले कुछ लोगों को स्पेनिश फ्लू हो गया. अगर गांधीजी इसका शिकार हो गए होते तो शायद हमें समय से आजादी नहीं मिल पाती. इसके साथ ही भारत में बड़े अकाल के कारण लोगों को दोनों वक्त खाना तक मिलना मुश्किल हो गया. अंग्रेज हिंदुस्तानियो की परवाह नहीं करते थे. खुद बड़े-बड़े बंगलो में रहते हुए उनसे दूरी बनाकर रखते थे. देश के तमाम डाक्टर सेना के साथ मोर्चे पर चले गए थे. तब हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी व लोग अंग्रेजो के तेजी से खिलाफ होने लगे.
तब भी मास्क अनिवार्य कर दिया गया था, हर आदमे मास्क में दिखाई देता था 

गंगा के किनारे लाशों से भर गए थे
ब्रिटिश डाक्टर भी देश में नहीं थे. वे भी मोर्चे पर सैनिको के साथ थे. इसके कारण देश की जाति व्यवस्था की अनदेखी कर लोग एक होने लगे व लोग महात्मा गांधी के पीछे एकजुट होने लगे. लोग बड़ी तेजी से अंग्रेजों के खिलाफ होने लगे. बरबाद हुई अर्थव्यवस्था ने मानो कोढ़ में खाज का काम किया. यह महामारी जून 1918 में मुंबई में शुरू हुई व अगस्त तक पूरे देश में फैल गई. सितंबर 1918 में मुंबई में सबसे ज्यादा लोग मारे गए.  हालात इतने खराब थे कि दिवंगत कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी लेखनी में लिखा था कि गंगा किनारे लाशों से भर गए थे.  इतनी ज्यादा संख्या में मर रहे लोगों का दाह-संस्कार करने के लिए लकड़ी की कमी हो गई. बताते हैं 29 मई 1918 के दूसरे विश्व युद्ध में सैनिको को लेकर एक जहाज मुंबई पहुंचा व 10 जून को मुंबई पुलिस ने सात जवानो को इन्फ्लुएंज़ा से पीडि़त होने के कारण अस्पताल में भर्ती करवाया. इनके थ्रू ही देश में यह महामारी आई, इसके बाद से स्पेनिश फ्लू भारत में फ़ैल गया.  

वह स्पेनिश फ्लू की भारत में शुरुआत थी. फिर रेलगाड़ी के कारण व मोर्चे से लौटने वाले सैनिको के कारण यह रोग पूरे देश में फैल गया. यह बीमारी मार्च 1920 तक चली. मुंबई में 6 अक्तूबर 1918 को एक दिन में ही 768 लोग मारे गए. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के परिवार के कई सदस्य इस बीमारी के कारण मारे गए थे. बाद में स्वच्छता आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि गंगा ही नहीं तमाम अन्य नदियां भी लाशों से भर गई थी. गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा हम लोगों के जिंदा रहने की इच्छा समाप्त हो गई है, जहां ब्रिटेन में प्रति 1000 लोगों पर 4.7 लोग मर रहे थे वहीं भारत में यह संख्या 20.6 प्रति हजार थी. सूखे व अकाल के कारण भूखे लोगों की रोग(वायरस) से लड़ने की क्षमता काफी कम हो गई. कम खाने व परिवार से ध्यान न दिए जाने के कारण महिलाएं ज्यादा मरी थी. तब सफाई का काम करने व लाशों के दाह संस्कार में हिस्सा लेने वाले ज्यादा भारतीय इसका शिकार होकर मरे थे.


1857 के गदर के पीछे भी उससे पूर्व की बीमारी का बहुत बड़ा हाथ था
तब हिंदू महासभा ने कहा था कि यह बीमारी बताती है कि हमें जानवरो की हत्या करके उन्हें नहीं खाना चाहिए. इसके बाद 1897 में ब्रिटिश शासन ने एपीडेमिक डिजीज एक्ट (महामारी बीमारी कानून) बनाया, जिसका इस्तेमाल मौजूदा सरकार ने लोगों के इक्ट्ठा होने व खरीददारी व रेल यात्राएं बंद करने के लिए इस्तेमाल किया. इतिहासकार मानते हैं कि 1857 के गदर के पीछे भी उससे पूर्व की बीमारी का बहुत बड़ा हाथ था. इससे पहले दुनिया व देश प्लेग की महामारी का शिकार हो चुका था.

स्पेनिश फ्लू भी परिवहन के जरिए दुनिया में पहुंचा था
उस महामारी के दौरान रामकृष्ण मिशन व सोशल सर्विस लीग ने लोगों की काफी मदद की थी व तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने आयुर्वेद दवाओं को आजमाना शुरू किया था. उस समय समाज में आपसी दूरी सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल हो गया था. स्पेनिश फ्लू भी परिवहन के जरिए दुनिया में पहुंचा था व आज हवाई यात्राओं के कारण कोविड वायरस ने दुनिया भर को अपना शिकार बनाया है. अंतर सिर्फ इतना है कि तब 20-40 साल के लोगों को इसने अपना ज्यादा शिकार बनाया था, जबकि आज यह बुजुर्गो को ज्यादा शिकार बना रहा है. तब भी अर्थव्यवस्था बरबाद हो गई थी व आज भी यही हो रहा है.

तब मुंबई गुजरात का हिस्सा होता था व गुजराती महात्मा गांधी को अपना आंदोलन खड़ा करने में इसका लाभ मिला था. तब भी लोग त्रस्त थे व आज भी काफी परेशान है. आज भी गुजरात और महाराष्ट्र को इसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. आज भी हमारे पास इस वायरस से निपटने की कोई दवा नहीं है. गनीमत बस इतनी ही है कि आज दुनिया के दूसरे देश की तुलना में हमारे यहां होने वाली मौतें व इससे प्रभावित होने वालो की संख्या फिलहाल काफी कम है.

हमारे यहाँ घर में जब लाइट बिजली चली जाती है तो हम सबसे पहले पड़ोसी के घर की तरफ देखते हैं, उसके घर गई या नहीं. उसके घर भी चली गई है तो हम अपने आप में संतोष कर लेते हैं चलो कोई बात नहीं सबके यहां गई है. ठीक वैसा ही कोरोना को लेकर हमारी सरकार कर रही है. बताया जा रहा है आज दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में हमारे यहां होने वाली मौतें व इससे प्रभावित होने वालों की संख्या फिलहाल काफी कम है. सो हम उसे उस गंभीरता से नहीं ले रहे, जितना कि लेना चाहिए. एक लॉकडाउन के अलावा कोई ठीक से इंतजाम आज हमारे पास नहीं हैं.


पिछले हर 100 साल में यह महामारियां फैलीं- 
प्लेगः 1720 में पूरी दुनिया में प्लेग फैला था. 1720 की शुरुआत में साउदर्न फ्रांस में करीब 1.26 लाख लोग प्लेग की वजह से अपनी जान गंवा बैठे थे. प्लेग का कहर 1720 से 1722 के बीच देखने को मिला था. इसे ग्रेट प्लेग ऑफ मार्सिले कहा जाता है, मार्सिले फ्रांस का एक शहर है, जहां इस महामारी से सबसे ज्यादा लोगों ने जान गंवाई थी. 

हैजाः यह महामारी 1817 में फैली थी. रॉबर्ट वुड जॉनसन फाउंडेशन के मुताबिक यह महामारी 1817 से कोलकता से फैली थी, जिसका असर 1820 तक रहा. 

स्पैनिश फ्लूः इस महामारी ने 1918 से 1920 के बीच में कहर मचाया था. इस महामारी से दुनिया भर में करीब 50 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे, जबकि करीब 5 करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस महामारी की शुरुआत स्पेन से नहीं हुई थी, फिर भी इसका नाम स्पैनिश फ्लू रखा गया. दरअसल इसकी वजह कुछ और है, वॉशिंगटन पोस्ट के एक आर्टिकल के मुताबिक प्रथम विश्व युद्ध के समय स्पेन ऐसा देश था, जिसने इस महामारी के फैलने की खबर को दबाया नहीं और पूरी ईमानदारी से सबके सामने रखा. बाकी देश इस चक्कर में इस महामारी के फैलने की खबर इसलिए नहीं सार्वजनिक होने दे रहे थे कि उन्हें डर था कि इससे सैनिकों का मनोबल टूटेगा.




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