सुना है करोड़ों निकला है मेरे नाम पर



 मज़दूर तेरी यही कहानी, दो कवितायें 




लॉकडाउन देश में हैं अपने घरों में सब,
किंतु चंद दिन में ही जेब मेरी तंग है,
ये अट्टालिकाएँ सारी चुपचाप हैं खड़ीं
मेरी ही बनाई हुई सड़कें भी बंद हैं,
कोई भी न आया अब तक मेरी सुध लेने
सुना है करोड़ों निकला है मेरे नाम पर,
लगता है रणनीति बन रही है अभी तक
बैठकें ही हो रही करोना रोकथाम पर,
मेरी तो चलेगी नहीं जिसकी भी चलती हो
बिल्डरों से बोल दे वो बोले सरकार से,
माल से वो बोल दे व बोले वालमार्ट से
व बोल दे वो पूँजीपतियों के संसार से,
विश्व महामारी में कोरोना के क़हर में,
भूखे रह गए हम उनके शहर में!!

खाली जेब कौन मुझे गाँव पहुँचाएगा

झुग्गी में रहा तो भूख से ही मर जाऊँगा
निकला यदि बाहर तो करोना खा जाएगा,
रेल का किराया नहीं बस का किराया नहीं
खाली जेब कौन मुझे गाँव पहुँचाएगा,
आज भी ये हाँथ पाँव काम मेरे आएँगे,
चलते ही चला जाऊँगा मैं थक हारकर,
किंतु अब और कर सकता नहीं इंतज़ार
विश्वास बचा नहीं है अब और सरकार पर,
कवियों की कविता के पत्र पत्रकारिता के,
काम आते शान को बढ़ाने हम रहीशों के,
जीवन धनपतियों को कर्जदारों को तड़प
आ जाती लाश मेरी काम सत्ताधीशों के,
हम तो सदा से ही हैं साधन उनके साध्य के
किंतु आज कोई पूँजीपतियों को बोल दे,
सर्वहारों की व्यथा देशभक्तों को कोई
ईक्वीसवीं सदी को कोई सदियों से बोल दे,
कोई ठेकेदारों उन शोषकों को बोल दे
ज़मींदार सदियों के बहरों को बोल दे,
विश्व महामारी में कोरोना के क़हर में,
भूखे रह गए हम चलते डगर में!!




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

1 comments:

abc abc