देशी मजदूरों के लिए मौत, विदेशियों के लिए लाल गलीचे




औरंगाबाद के पास मौत की नींद सोए मध्यप्रदेश के सोलह मजदूरों के दुखकातर परिजनों के लिए पीएम-सीएम और अक्सर इस तरह के हादसों के बाद घडिय़ाली आंसू बहाने वाले नेताओं का विलाप बेमानी है। रेल की पटरियों पर क्षत-विक्षत लाशों के बीच छितरी पड़ी सूखी रोटियां, जहां-तहां बिखरे सस्ते सूटकेश, कपड़े-लत्ते, रुपए, सिक्के, जूते-चप्पल इत्यादि इन मजदूरों की दुरावस्था खुद बयान कर रहे थे। यूं तो लॉकडाउन की दर्दनाक दास्तानें ढेरों हैं, लेकिन यह उनमें अब तक की सबसे दर्दनाक कहानी है। 


सोमदत्त शास्त्री 

सरकारी छलावा और फांकाकसी में फंसे मजदूर जो औरंगाबाद में जलगांव की एक स्टील फैक्टरी में काम करते थे, यह सुनकर पैदल ही औरंगाबाद के लिए रवाना हो गए कि वहां से मध्यप्रदेश के लिए ट्रेनें रवाना हो रही हैं। रेलवे ट्रैक पर चालीस किमी चलने के बाद थक कर चूर मजदूर पटरियों पर ही लेटकर सो गए और बेरहम मालगाड़ी ने उन्हें सदा के लिए मौत की नींद सुला दिया। ये मजदूर मध्यप्रदेश में शहडोल और उमरिया के थे। किस्से बेसुमार हैं। दुधमुंहे बच्चों को गोद में उठाए माताएं सैकड़ों किमी के अंतहीन मुश्किल सफर में तपती सड़कें नाप रही हैं। 



छत्तीसगढ़ का कृष्णा लखनऊ में जानकीपुरम में रहता था, पैसे खत्म हुए तो घबराकर उसने तय किया कि वह साइकिल से ही घर जाएगा और वह अपनी पत्नी व बच्चों को साइकिल पर बैठाकर चल पड़ा, लेकिन लखनऊ में ही किसी अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी। इस टक्कर में कृष्णा और प्रमिला की मौत हो गई। तीन व चार साल के दोनों बच्चे लोहिया अस्पताल में जीवन-मौत से जूझ रहे हैं। मुंबई और उसके आसपास से अपने-अपने गांव के लिए पैदल चल पड़ी सैकड़ों लोगों की भीड़ में ग्यारह महीने के बेटे को गोद में थामे प्रीति सवाल उठाती है कि मेरे पास न पैसे हैं न रोजगार। मैं अपने बच्चे को क्या खिला कर जिंदा रखूं। अपने परिजनों के साथ रहूंगी तो सुरक्षित रहूंगी।

लॉकडाउन में दो तरह के लोग बेचैन हैं एक वे जो प्रवास पर हैं और घर लौटना चाहते हैं। इन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने की इजाजत लेने में पसीना आ रहा है। दूसरे वे हैं जो राज्य में ही एक जिले से दूसरे जिले जाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को भी बेशुमार मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं। राज्य और केंद्र सरकारें ई-सिस्टम होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। सवाल यह है कि अनपढ़ मजदूर जाएं तो जाएं कहां? किससे अपना दुख बयान करें। 

बिडंबना यह है कि देश में विभिन्न राज्यों और जिलों में फंसे लोगों को ठिकाने तक पहुंचाने की कोई पहल भले न हो, लेकिन विदेशों में फंसे लोगों को लाने की तैयारियां युद्ध स्तर पर जारी हैं। किसी को हवाई जहाज और किसी को जलपोत से लाने की तैयारी है। वंदेभारत मिशन के तहत भारत लौटने वालों के लिए मुंबई में 88 होटलों में कोई साढ़े तीन हजार कमरे तैयार रखे गए हैं, जहां इन प्रवासियों को क्वारेंटाइन किया जाएगा। इनके लिए 84 स्पेशल फ्लाइट्स चलाई जाएंगी। अफसोस यह है कि देश के लोग सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे हैं और विदेश से आने वालों के लिए लाल कारपेट बिछाई जा रही है। आखिर यह भेदभाव क्यों?



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