यात्रा अनुभव, यदि आपको भी इस Lockdown में किसी अपने को लेने कहीं दूर जाना है तो यह अनुभव बहुत काम का है




दिल्ली से रीवा मध्यप्रदेश यात्रा अनुभव, यदि आपको भी इस Lockdown में किसी अपने को लेने कहीं दूर जाना है तो यह अनुभव बहुत काम का है, जिसे सोशल मीडिया पर मित्र ने शेयर किया है अवश्य पढ़ें.. 

लगभग 20 पास के आवेदन के बाद आख़िर घर जाने का ऑनलाइन पास मिल गया और मुखर्जी नगर से निकल कर अपने घर, गाँव पहुँच गया हूँ.  और यात्रा में हुए कुछ अनुभव बताने को उत्सुक हूँ.   


5 मई की सुबह 3:30 बजे निजी वाहन से मैं और मेरी 2 बहने निकल पड़े,  हमने सीधे आनंद विहार की जगह UP बॉर्डर के लिए शाहदरा बॉर्डर से जाने का निर्णय लिया जिसका कारण था कि बॉर्डर में मेरे एक पहचान के चाचा जी उपस्थित थे जो रात भर मेरी वजह से ना सो पाये थे. शाहदरा पहुँचने के बाद हमारी गाड़ी किनारे लगाई गई और हमारे काग़ज़ात की जाँच हुई. इसके बाद मेहनती पुलिस एक कर्मी ने पूछ लिया शरद हिंदू नाम है या मुस्लिम , तभी एक क़ोरोना वरियर ने जवाब दिया ये तो पंडित जी है. हालाँकि हमारे चाचा जी वही पर तैनात थे,  लेकिन मैंने उन्हें अभी फ़िलहाल बुलाना उचित नही समझा.  



मेरी एक बहन ने घर से निकलने से पहले ज़बरन अपनी लिपस्टिक का चंदन लगा दिया था. मैंने उसे पालघर वाली याद दिलाई कि 75-80 वर्ष के संत तो सुरक्षित नहीं है तो यह चंदन जान नहीं बचायेगा.  

जाँच पूरी हुई और अंततः चाचा जी से बात कर निकल आए दिल्ली से बाहर,  चूँकि दिल्ली और UP की सीमायें कई बार आई इस कारण लगभग 9-10 जगह जाँच हुई,  अंततः नोयड़ा एक्सप्रेस वे से हम आगरा की ओर बढ़ चले.   आगरा, कानपुर,  प्रयागराज और अंततः रीवा.  



यात्रा में 2-3 बातें जो बताना ज़रूरी समझता हूँ, 900 किमी की इस यात्रा में में मुझे लगभग 1 लाख पैदल चलने वाले मज़दूर मिले,  गाड़ियाँ अभी भी कम चल रही है,  फिर भी ट्रक,  अंबुलेंस, और पास वाले निजी वाहन चल रहे थे.   


रास्ते में पड़ता हर मज़दूर गाड़ी आते देख रुक कर हाथ हिलता कि शायद उसे कोई ट्रक बैठा ले. कुछ मज़दूर ट्रैक्टर में भरे मिले,  कुछ साइकल वाले ग्रूप में,  कुछ थक कर सोये हुए, और कुछ टोल प्लाज़ा के सार्वजनिक शौचालय के बाहर. सार्वजनिक शौचालय का प्रयोग हमने नहीं किया, क्योंकि वहाँ 500 लोगों की भीड़ होती थी. 


900 कि.मी. में 20टोल 900  लगे

हमने खेत, जंगल जाना ज़्यादा उचित समझा और घर से लगभग 30 लीटर पानी लेकर चले थे उसका भरपूर उपयोग किया.  मुझे टोल प्लाज़ा का इतना अंदाज़ा नहीं था, लगभग 20 जगह टोल मिले,  जहाँ कुल मिला कर 900₹ लगे,  हमने हर बार पैसों को एक अलग प्लास्टिक में लिया और हाथ सेनीटाइज किया.  


मार्ग में हमने कहीं भी कुछ ख़रीद कर नही खाया बल्कि एक खेत में पेड़ के नीचे बैठ कर ख़ुद घर से लाये फल खाये.  साथ में बहन होने के कारण गाड़ी यात्रा दिन में करना ज़्यादा उचित समझा और शाम तक घर पहुँच गये.  


मज़दूरों का जत्था इलाहाबाद तक ही मिले,  MP में लगभग 100 कि.मी. की यात्रा में मज़दूर नहीं मिले,  कई जिलों में मजदूरो को प्रशासन ने लाइन में खड़ा कर रखा था. शायद उन्हें घर भेजा जा रहा था जो पैदल चल कर आए थे.  


घर आते ही बाहर ही गुनगुने पानी से ख़ुद नहाया और वाहन और सामान को सेनीटाइज किया,  और फिर बिना घर के अंदर गये 1 कि मी ही स्थित सरकारी अस्पताल जाँच के लिये पहुँच गये. 
चूँकि हमारे जिले में एक भी केस नहीं है, अतः हमें वहाँ अछूतों की तरह देखा गया.  जाँच के बाद घर के ऊपर के अलग कमरों में अब हमारे रहने की व्यवस्था है. 


मेरे सगे चाचा चाची और उनके बच्चे बाहर नहीं निकले है,  आज घर में मेरी दूसरी सुबह है,  ख़ैर सुरक्षा रखना ज़रूरी है.  

गाँव में ख़ाली बैठे जो लोग सुबह मेरे घर में बैठ राजनीति बतियाना पसंद करते है,  2 दिन से नहीं आये इसके कारण मेरी मम्मी को बार बार चाय बनाने कि ज़रूरत नहीं है.  


मेरी दादी हमारे आने से ख़ुश है,  लेकिन गाँव परिवार में मातम सा छा गया है.  


हमारे गाँव में हर घर में २ गंजेडी है जो एक ही चोंगी से गंजा पीते है,  मुझे उनकी चिंता है. उनके फेफड़े और उनका ये सामूहिक शौक़ दोनो ही उनके लिए ख़तरनाक है. 


हर घर में एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पैर में पहिये लगे है,  जो घर में नहीं टिक पाता,  मेरे आने से शायद अब मेरे घर कोई ना आए तो ही अच्छा है. 

गाँवों में सस्ती दारू ख़ूब मिल रही है,  क्योंकि कल मुझे कई ऐसे लोगों से फ़ोन पर बात हुई,  जिन्होंने क़ोरोना से बचाव के लिए महुआ से बनी सस्ती दारू को इसका इलाज ही समझ लिया है और उसे महुआ महारानी का नाम दिया है, इन्हें भी भगवान बचाये.


ख़ैर घर में रहिये, अपना और अपनो का ख़ूब ख़याल रखिये.  





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