कोरोना महामारी में भटकते मरते मजदूरों ने लगा दिया, जिम्मेदारों की देश के प्रति निष्ठा पर सवालिया निशान





मजदूरों को लेकर आज सरकार की वह हालत हो गई है कि 'न निगलते बने न उगलते'. मजदूर के मुद्दे को हवा देने में मीडिया की बड़ी भूमिका सामने आ रही है. क्या यह वही मीडिया है, जिसे गोदी मीडिया कहा जाने लगा था. तो पता चलता है कि असल में जनता के सोशल मीडिया के सामने वह गोदी मीडिया भी ढेर हो गया. जनता के हर हाथ में कैमरा था और वह क्लिक हो रहा था. मजदूर की कोई भी हालत तत्काल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थी, सरकार कुछ समझ पाती इसके बहुत पहले ही इससे सरकार विरोधी माहौल बनता चला गया. 

यह खूब चर्चा में है कि इस महामारी की जानकारी बहुत पहले जनवरी में ही मिल गयी थी, लेकिन तब इस पर ध्यान नहीं दिया गया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी चेताया था, लेकिन तब ट्रम्प की अगवानी की जा रही थी और इसके कुछ समय बाद ही मध्यप्रदेश की सत्ता पलटने का सिंधिया रूपी ब्रहमास्त्र हाथ लग गया तो साहब उस में लग गए. 

VIDEO खिलौना गाडी बनाकर बच्चों को घर ले जा रहा मजदूर कह रहा है लॉक डाउन केवल गरीबन के लिए है किसी और के लिए नहीं दारु बिक रही, मुर्गा बिक रहा...

जब देश में संक्रमण बहुत कम था, तब बिना विवेक के ताबड़ तोड़ लॉकडाउन कर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली और आज जब संक्रमण काफी बढ़ गया है, लाख के आंकड़े को छू रहा है, तब शराब जैसी दुकानें खोली जा रही हैं, कई प्रकार की छूट के लिए राज्य सरकारों पर जिम्मेदारी डाल दी जा रही है कि वह चाहें तो.. आपस में सहमत हों तो बसें भी चला सकती हैं.   



इस सबमें कहीं लगा ही नहीं कि आप एक देश चला रहे हो. सरकार के पास एक बुद्धिजीवी, अच्छा शिक्षित आईएएस वर्ग रहता है. सवाल है एक बहुत बड़ी परीक्षा पास करके आने वाले अधिकारी भी आपको क्यों नहीं सचेत कर सके? इन लोग का भी दिमाग क्या कुंद हो गया? और आज भी क्यों वह मजदूरों को व्यवस्थित घर पहुंचाने की योजना नहीं बना पा रहा? लम्बे समय से सत्ता हाथ में है, लेकिन अचानक कोई समस्या आ जाए तो उससे निपटने की कोई पुख्ता योजना सरकार के पास क्यों नहीं थी? कहीं इस सबके पीछे अपने पसंद के अधिकारी चुनने के चक्कर में योग्य अधिकारियों को दरकिनार करना एक बड़ी बजह तो नहीं? 


हालांकि समस्या अचानक आ गई, ऐसा भी नहीं है, पर उसे उस प्रकार से लिया ही नहीं गया. देश चलाने वाले ही आँखें बंद कर लेंगे तो आम आदमी के पास कैसे कोई बात पहुंचेगी. मीडिया की कहें तो उसमें भी अब वह जिम्मेदारी नहीं रह गई है अन्यथा जैसे आज 400 साल का पुराना रिकार्ड खंगाला जा रहा है, यह पहले से भी पता होना चाहिए था और उससे निपटने की पूरी तैयारी भी होनी चाहिए थी. 


आज मजदूर, मजबूर होकर जिस तरह मारा-मारा फिर रहा है, बेमौत मर रहा है, वह बेहद चिंता की बात है और हम सब जिम्मेदारों के लिए बेहद शर्मनाक भी.. मजदूर भी अचानक घर की ओर नहीं भागे, जब कोई और मार्ग नहीं दिखा या नहीं मिला और जीवन खतरे में लगने लगा तो अपना गाँव याद आ गया बस. 

VIDEO कलेजे के टुकड़े को सूटकेश पर सुलाकर ढोते बेबस मां मजदूर 


हम यह स्थिति संभाल सकते थे, अभी भी संभाल सकते हैं, लेकिन इरादे तो हों, जो दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते. आज मजदूरों के मुद्दे पर सरकार फंसी हुई नजर आ रही है. 20 लाख करोड़ जैसी बड़ी राहत की बात कुछ घंटे भी नहीं चली. सोचने वाली बात यह भी है कि इतने बड़े पॅकेज के बाद भी शेयर बाजार दुसरे दिन ही धड़ाम हो गया. 

क्यों हमारे पास यह जानकारी पूर्व से नहीं है कि किस राज्य के कितने लोग, किस राज्य में क्या काम कर रहे हैं? उनकी क्या व्यवस्था है? आपातकाल में उपयोग के लिए उनके बैंक खाते संकलित क्यों नहीं थे और आज भी ऐसा नेटवर्क क्यों नहीं है कि हम यह कर सकें. यही नेटवर्क चुनाव के समय तगड़ा कैसे हो जाता है कि वोट के लिए हम घर-घर पर्ची पहुंचा देते हैं. ठीक है इन मजबूरों की आज भी सुध नहीं ले सकते तो इनकी हाय के लिए तैयार रहिये.

और अंत में 
जड़ों को सींचते तो आंधियाँ भी सह जाते
बस्तियाँ यूँ न हवाओं के करम पर रहतीं.
VIDEO गरीबी के चलते बैल बेंचना पड़ गया, फिर खुद जुत गया बैल की जगह बेबस मजदूर 






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