देशवासियों को झकझोरते प्रवासी मजदूरों के सैलाब के भयावह दृश्य



आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी गाँव, गरीब-मजदूर और किसान की स्थिति जस की तस क्यों? 

इतने सारे मजदूर जो देश के सभी बड़े राज्यों की सीमाओं पर अपने घर जाने की जद्दोजहद में लगे हैं. ये मजदूर अभी तक कहाँ थे? क्या ये बेचारे अपने घर-परिवार गाँव से पलायन करके महानगरों में मजदूरी कर रहे थे? क्या इसका साफ मतलब यह है कि ग्रामीण भारत में रोजगार का इतना भारी अभाव रहता है? यह ज्वलंत प्रश्न है? देश की सड़कों पर प्रवासी मजदूरों के सैलाब के भयावह दृश्य तमाम देशवासियों को झकझोर रहे हैं. ये दृश्य पूछ रहे हैं कि देश की आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी गाँव, गरीब-मजदूर और किसान, इन वर्गों की स्थिति जस की तस क्यों है? 




राजेश मूणत 

आज़ादी के बाद की तमाम सरकारें इन वर्गों की स्थिति में बदलाव लाने के वादे कर सत्ता हाँसिल करती रही हैं. मजेदार बात यह है की गरीबी हटाओं जैसे नारे से भी देश में सरकार बनाई जा चुकी है. एक सवाल यह भी है की देश में सत्ता की बागडोर ज्यादा समय तक कौन से दल के हाथ में रही. क्या यह दल अपने आपको गरीब मजदूरों का सच्चा हमदर्द बताता है. यदि यह दल वाकई हमदर्द था तो इन वर्गों के सामने रोजगार के लिए पलायन करने की मजबूरी आज तक क्यों है? लगातार सत्ता पर काबिज रहने वाली पार्टी आज विपक्ष में है. सरकार में थी तब वह अपने उत्तरदायित्वों को नही निभा सकी थी. इसलिए आज उसकी दुर्दशा हो गई है, लेकिन वर्तमान सरकार को भी यह तो बताना ही पड़ेगा कि अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का ख्याल रखने के उसके वादों के अनुरूप उसकी नीतियाँ क्यों नजर नहीं आती हैं. 

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी के नाम की दुहाई देने वाले ये राजनैतिक दल गांधीजी की इस थ्योरी को क्यों नही मानते की भारत की आत्मा गावों में बसती है. कुल मिलाकर इस सत्य को क्यों दरकिनार कर दिया जाता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के बगैर हालातों में बदलाव नही लाया जा सकता है. दुखद यह है की विषाणु संकट के बाद तहस नहस हो गई तमाम व्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के प्रयासों में भी एमएसएमई पर ज्यादा फोकस है, जबकि अर्थव्यवस्था को सुचारू करने के लिए ग्रामीण अंचल में स्थायी रोजगार सृजन पर ज्यादा काम किया जा सकता है. ग्रामीण अंचल में मौजूद सामुदायिक सुविधाओं की वर्तमान स्थिति और उनमें व्यापक बदलाव के लिए भी सरकार की कोई रणनीति अभी तक सामने नहीं आई है. 

सूटकेस वाले बच्चे के वीडियो पर 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने संज्ञान लेकर पंजाब और यूपी सरकार के मुख्य सचिव के अलावा आगरा के डीएम को नोटिस भेजा है. आयोग ने कहा है कि ऐसी घटनाएं केवल स्थानीय अधिकारियों की 'लापरवाही और अनुचित नजरिया' दिखाती हैं. ज्यादा के लिए  CLICK करें 


पुराने उधोगों को नया ऋण देने के लिए सरकार ने नीति बनाई, जबकि वर्तमान परिदृश्य में ग्रामीण अंचल में कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उधोगों की नवीन इकाइयों का जाल बिछाने की है. लॉक डाऊन के इस दौर में नकद फसलों को बाज़ार नही मिल पाया. इससे किसानों का भारी नुकसान हुआ और फसलें खेतों में ही सड़ गई. यदि खाद्य प्रसंस्करण उधोग के लिए ग्रामीण युवाओं को प्रोत्साहित किया जाता है तो रोजगार के साथ उपज के उचित मूल्य मिलने की समस्या स्वमेव हल की जा सकती है. विषाणुजनित वर्तमान संकट एकदम नया और सर्वदा अपरिचित आपदा है. इसलिए शुरुआत में लिए गए निर्णयों में रह गई कमी खामियां लोगो ने चुपचाप बर्दाश्त की है. लेकिन अब इस युद्ध से लड़ने के लिए पक्ष-विपक्ष को समन्वित प्रयास करना होंगे. वरना आम जनता की नजरों में सभी दल विश्वसनीयता खो चुके है. 

आरोप-प्रत्यारोप करते समय यह विचार जरूर करें कि एक उंगली सामने वाले पर उठाने पर और चार उंगली स्वयं पर स्वमेव उठती ही हैं. आज जरूरत इस बात की है कि इस वैश्विक महामारी से बचने के साथ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मानवता के सच्चे सिपाही पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बताए मार्ग पर ईमानदारी से आगे बढ़ने के लिए उनके बताए दिशा-निर्देशों का ईमानदारी से पालन हो.



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