दर्द मजदूरों का, भूख से बिलखते मासूम कचरे के ढेर में ढूंढने लगे निवाला



चुपके से सिसकियाँ भरी ओर चल दिये अपने मुकाम पर, मजदूर जो मजबूर है उसे रोने तक की इज़ाज़त नहीं. आज के हालात में  सरकारें मजदूर हितेषी होने का नक्कारा पीट रही हैं, पर लाखों मजदूर तपती धूप में अपनी गृहस्थी कि पुटरिया सिर पर लादे बदहवास हालात में हजारों किलोमीटर दूर अपने मूल आशियाने कि छाँव के लिये पैदल ही भागा जा रहा है. सड़को पर कतारे लगी हैं, जो मजदूरो कि मजबूरी की दास्ताने पन्नों में लेख कर रही हैं. भूख प्यास की वो तड़फ छतरपुर के बस स्टेण्ड पर देखने को मिली जब ट्रक में ठूस कर लाये मजदूरो  के बच्चों ने कचरे के ढेर में अपनी बिलखती भूख का निवाला तलाशना शुरू कर दिया. मजदूर स्वाभिमानी थे, तो उन्होंने मासूमों को पीट दिया, लेकिन सरकार के तंत्र के पास ना तो स्वाभिमान है और ना ही संवेदनशीलता.         


छतरपुर से धीरज चतुर्वेदी           

गुरुवार को  हरियाणा से एक ट्रक में लदकर मजदूर छतरपुर बस स्टैंड आये. यह मजदूर छतरपुर जिले के विभिन्न गाँवो के थे. ट्रक से उतरते ही मजदूरो के मासूम बच्चों ने कचरे के ढेर में पेट भरने का निवाला ढूंढना शुरू कर दिया..  बच्चों के पिता ने देखा तो बच्चों कि पिटाई तक हो गई.  दर्द भरा चित्रण था. लोगो ने देख कि सभी भूखे है तो पत्रकारों कि पहल पर सामाजिक संस्थाओ को जानकारी दी गई. समाज सेवियो ने हैसियत अनुसार भोजन उपलब्ध कराया. करीब 150 लोगो के लिये भोजन पर्याप्त नहीं था तो प्रशासनिक मदद के लिये एसडीएम को जानकारी देनी चाही.. गजब का प्रशासनिक साम्राज्य है कि एसडीएम ने मोबाइल रिसीव करना उचित नहीं समझा. 


एक ओर वो स्वाभिमानी मजदूर थे जिन्होंने बच्चों कि तड़फती भूख पर भी अपना स्वाभिमान बरकरार रखा. वहीँ दूसरी ओर वो निर्लज्ज प्रशासन था जिस के अधिकारियो ने मोबाइल रिसीव करना तक उचित नहीं समझा. यही है पूंजीवाद-पद के रसूखवाद के सामने टूटते-बिखरते- मृत होते मानवतवाद कि निरंतर चलने वाली दास्तान. 

आखिर मजदूर क्यों सड़को पर बिलख रहा है, उसकी सिसकियों से क्यों उन नीतिकारों के कलेजे नहीं कापते, क्योंकि उन्होंने कभी भूख का सामना नहीं किया. उनके बच्चों ने भूख कि तड़फन नहीं महसूस की. आज सरकार की नीति कटघरे में है लॉक डाउन घोषणा करनी थी तो पहले ही मजदूरो को ुंकड घर पहुंचवाया जा सकता था. आज लाखो मजदूर भूख से लड़ता हुआ तपती सड़को पर झुलसती गर्मी में भागा जा रहा हे.. इधर जब कोरोना वायरस का प्रकोप नासूर बना है तब सरकारों को मजदूरो की पीढ़ा पर मलहम लगाने का नीति पर काम किया जा रहा है.  

सवाल है जब यही करना था तो लॉक डाउन घोषणा के पहले ही कर देते. उन मजदूरो ओर उनके परिवार के बारे में क्या योजना है जो भूखे प्यासे, लहू बहते पाँव की परवाह किये बिना सड़को पर है जो कभी सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाते है तो कभी ट्रेन से कटकर मौत का शिकार हो जाते है कई खबरे आई की रास्ते में खाली पेट ओर भीषण गर्मी को मजदूर व उनके परिवार नहीं झेल सके ओर मृत्यु हो गई. अजीब दस्ता है ये, कहाँ शुरू कहाँ ख़तम, ये मंजिले है कौन सी, ना तू समझ सके ना हम.... 




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