ये सरिता जी हैं, पैसे नहीं, तब भी इनकी स्कूटी पर खाए जा सकते हैं राजमा चावल




''जीवन एक संघर्ष है... सभी को अपने और अपनों के लिए संघर्ष करना होता है, करते भी हैं, सरिता जी भी अपने और अपनों के लिए संघर्ष कर रही हैं और महिलाओं की तरह, पर सलाम इनकी सोच को है, भले ही ये कोई अम्बानी नहीं, जो सैकड़ो लोगों को मुफ्त में खिला दें, पर इनका दिल, इनकी सोच, अम्बानी जैसे लोगों से बहुत ऊंची और बहुत बड़ी है.''



ये हैं सरिता कश्यप. पिछले 20 साल से अकेली महिला (सिंगल मदर) हैं, इनकी एक बेटी है, जो कालेज में पढ़ती है. ये घर खर्चे के लिए दिल्ली के पीड़ागढ़ी में सीएनजी पंप के पास अपने स्कूटी पर राजमा चावल का स्टाल लगाती हैं. रेट, छोटा प्लेट 40 रुपये, बड़ा फुल प्लेट 60 रुपये पर.....अगर आपके पास पैसे नहीं भी हैं तो भी आपको ये भूखा नहीं जाने देंगी, "खाना खा लो, पैसे जब हो तब दे जाना या मत देना" ये कह कर आपको खिला देंगी, चाहे आप किसी भी जाती धर्म या सम्प्रदाय से जुड़े हुए हों. 

सरिता जी अपने पास के गरीब बच्चों को मुफ्त में खिलाती हैं और उनके स्कूल के कापी, किताब, ड्रेस, जूते यानि कुछ भी कम हो तो खरीद कर देती हैं, और हां, खाली समय में बच्चों को पढ़ाती भी हैं.

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, " को चरितार्थ करती पवित्र सरिता की तरह प्रवाहमान सरिता जी को उनकी ऐसी अच्छी सोच को हम नमन करते हैं. 

खबर श्री कमल कुमार जी के पेज से ली गई है. श्री कमल जी लिखते हैं ''सरिता जी को इस नेक काम के लिये धन्यवाद देता हूँ और ये दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करें, यही कामना करता हूँ...''



पोस्ट पर प्रतिक्रया मेंश्री  सुधाकर सिंह जी ने बड़ी ही अच्छी बात लिखी है ''जीवन एक संघर्ष है... सभी को अपने और अपनों के लिए संघर्ष करना होता है, करते भी हैं, सरिता जी भी अपने और अपनों के लिए संघर्ष कर रही हैं और महिलाओं की तरह, पर सलाम इनकी सोच को है, भले ही ये कोई अम्बानी नहीं, जो सैकड़ो लोगों को मुफ्त में खिला दें, पर इनका दिल, इनकी सोच, अम्बानी जैसे लोगों से बहुत ऊंची और बहुत बड़ी है.''  




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