भ्रम न पालें कि पार्टी को आपका विकल्प नहीं मिल सका, एक खुला खत शिवराज सिंह चौहान के नाम



वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रकाश भटनागर जी ने आज ही मुख्यमंत्री बने श्री  शिवराज सिंह चौहान जी को आईना दिखाने वाला एक खुला ख़त सोशल मीडिया पर शेयर किया है. वह ज्यों का त्यों यहाँ प्रस्तुत है-




माननीय शिवराज जी,
आज मेरा रंग में भंग करने का कोई इरादा नहीं है। चौथी बार आपने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर रिकार्ड बनाया। आपको बहुत शुभकामनाएं और बधाई। ये शुभकामनाएं और बधाई एक पुराना मित्र होने के नाते दे रहा हूं। आप ऐसे राजनेता रहे हैं जिन्हें मेरे जैसे भोपाल के बहुत सारे पत्रकार अपना मित्र कह सकते हैं। आप तेरह साल मुख्यमंत्री रहे तो मैं आपसे शायद तीन-चार बार ही मिला होऊंगा। आपने चौथी बार इस प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाल लिया है। मुझे बहुत खुशी और संतोष दोनों हुए। चलिये, वोट देने वाले न सही, वोट लेने वालों के ही दम पर आपने साबित कर दिया कि 'टाइगर वाकई अभी जिंदा है'। प्रदेश के सियासी जगत में बीते सवा साल में जो जंगल वाला माहौल दिखा, उसने अंतत: आपके लिए एक बार फिर 'जमकर दहाड़ने' का रास्ता साफ कर दिया है। एक बात कहना है। इसे सुझाव न मानें। ये काम करने वाले तो आज की शाम से ही आपके इर्द-गिर्द हाजिर हो जाएंगे। मैं तो एक गुजारिश करना चाहता हूं वो ये कि इस प्रदेश को वे शुरूआती आठ साल लौटा दीजिए, जिसमें आप पहली और दूसरी बार यहां के मुख्यमंत्री रहे थे। मेहरबानी करके तीसरे और अपने पिछले कार्यकाल के पांच साल की दु:खद स्मृतियों को अपने आने वाले भविष्य पर हावी मत होने दीजिएगा।

शिवराज जी, उमा भारती और बाबूलाल गौर के आधे-अधूरे वाले कार्यकाल के दौर में जब आपने सत्ता संभाली थी, तब लग रहा था कि भाजपा को सरकार चलाना ही नहीं आता। प्रशासनिक अनुभव पर आपके भी सवालिया निशान थे और पहली ही बार में आप मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पद पर सीधे आए थे। इसके बाद आपकी सियासी पारी का आगाज बेहद सुखद रहा और एक लंबी रिकार्डतोड़ पारी खेलने का आपको मौका मिला। जाहिर है वो सब आपकी योग्यता, सहजता, जनता से करीबी और मेहनत का नतीजा था। शुरू के आठ साल का वह समय वाकई एक सच्चे जन प्रतिनिधि के कामकाज का अनुभव कराने में सफल रहा था। यही वजह रही कि आपके चेहरे के कारण ही राज्य की जनता ने लगातार तीसरी बार यहां भाजपा की सरकार बनने का रास्ता साफ किया था। लेकिन कहते हैं ना कि तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा। तीसरी पारी शुरू होते ही राज्य और आपकी राजनीतिक समझ को पता नहीं किसकी हाय लग गयी। आपका आत्मविश्वास पहले अति की स्थिति में पहुंचा और फिर मामला अतिवाद से भी ज्यादा बुरा हो गया। आप आत्मरति के स्वप्नलोक में कुछ यूं कुचाले भरने लगे कि' पांव-पांव वाले भैया' का जमीन से नाता ही नहीं रह गया। दरअसल, आपके आसपास पनपे कॉकस ने ऐसे हालात निर्मित किए। उन्होंने आपके नाम को बेचा। आपके काम को सियासी सौदेबाजी की तराजू में रखकर उसकी नीलामी कर दी। शिवराज जी, मैं जानता ही नहीं मानता भी हूं कि आपका हिसाब पूरी तरह, 'चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग' की तरह था। केवड़े के उस बेहद गुणकारी झाड़ के सदृश था, जिसके भीतर जहरील सांपों का पाया जाना बेहद कुदरती बात मानी जाती है। लेकिन हुआ यह कि ऐसे भुजंग आपकी समूची अच्छाई पर विष की बरसात करने में सफल हो गए। उन्होंने सरकार नामक संस्था के शिराओं में ऐसे विष का संचरण किया, जिसका तोड़ किसी के पास नहीं था। सिवाय मतदाता के। इसलिए उसने पूरे दु:खी मन से आपको लगातार चौथी पारी का मौका देने में कंजूसी बरत ली। स्वर्णिम मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश को देश में नंबर वन बनाने के सपने पर ऐसे लोग डाका डालने में सफल हो गए। आज आपने फिर मध्यप्रदेश को नंबर वन राज्य बनाने का विधायक दल की बैठक में वादा किया है। मुझे लगता है आप वो शख्स हैं जो गलतियों से सबक ले सकता हूं।

शिवराज जी, एक वीभत्स दंभ ने आपको उन पांच सालों में अपने भुजापाश में जकड़ रखा था। कभी समय मिले तो अपना 'कोई माई का लाल..' वाला वीडियो देखियेगा। मुझे यकीन है कि गुरूर से भरा वह चेहरा देखकर आप एकबारगी खुद को ही नहीं पहचान पाएंगे। क्षण-भर को ही सही, किंतु यह भी सोचिएगा कि अपनी छवि चमकाने के नाम पर आपने राज्य के खजाने की कितनी बुरी हालत कर दी थी। प्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आग लगने वाली हालत में आ गये थे और जनता विस्मय के साथ यह देख रही थी कि ऐसा उस शख्स के समय में हो रहा है, जिसने कभी खुद सायकिल चलाकर तेल की कीमत में वृद्धि वाले खेल का विरोध किया था।

आपके कार्यकाल के आखिरी पांच साल आपके इर्द-गिर्द वाले कई दस नंबरियों की बदौलत उस पंचवर्षीय योजना जैसी भयावह बन गयी, जिसके मूल में प्रदेश या इसकी आवाम का हित तलाशना 'भूसे के ढेर में सुई की खोज' जैसा दुरूह काम हो गया था। आपके आसपास के अधिकांश लोगों का व्यवहार तक मगरूरियत का पर्याय बनकर रह गया था। और अफसर, उनका उन्मादी आचरण....उफ... उनका उन्मादी आचरण तो शर्मनाक कहकर भी सही तरीके से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। वल्लभ भवन में गूंजते उनके ठहाके 'मोगैम्बो खुश हुआ' की खलनायकी याद दिलाते थे। कपट से भरी वह मुस्कुराहट उनके कामकाज का अनिवार्य हिस्सा बन गयी थी, जिसके पीछे केवल और केवल निजी महत्वाकांक्षाओं एवं मकसदों के पूरा करने की कुटिलता ही छिपी हुई थी। भावांतर योजना का नारकीय हश्र हो या हो मंदसौर का गोलीकांड, दोनों ही मामलों के आईने को कभी गौर से देखिएगा। आप पाएंगे कि अफसरों पर आंख मूंदकर भरोसा करने की भूल आपको अंतत: ले डूबी। सच कहूं तो योजनाओं की अच्छाई के मामले में आपकी सरकार का यदि कोई सानी नहीं था तो उन्हीं योजनाओं की दुर्गति के आपके कार्यकाल जैसे उदाहरण भी कहीं और मिल पाना मुश्किल है। जिस मशीनरी पर इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयवन की जिम्मेदारी थी, उसके कर्ताधर्ताओं ने ही इनकी मिट्टीपलीद कर दी। मंत्री तथा विधायक लगातार शिकायत करते रहे कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते हैं। लेकिन आपने इस ओर ध्यान नहीं दिया। याद रखिएगा कि आपके पहले आठ सालों में आपके भरोसेमंद अफसर कैसे थे। बाद के पांच सालों में आप किनके भरोसे रह गए। आप नए सिरे से भी अच्छे लोगों को तलाश लेंगे क्योंकि अब बहुत सारे तो आपके सामने अनावृत हैं ही।

आपके परम मित्रों में से एक कैलाश विजयवर्गीय ने जिस समय ठाकुर के कटे हाथों वाली बात कही थी, आपको तब ही सतर्क होकर यह सोचना चाहिए था कि यह कटाक्ष ही सही, लेकिन उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जिससे प्रदेश परेशान है। सोचिए कि जब मंत्री, विधायक सहित पार्टी के आला नेता तक अफसरों से त्रस्त थे, तो आम जनता की क्या हालत हो गयी होगी। आप लाड़ली लक्ष्मी का नारा लगाते रहे और बलात्कार की घटनाओं में नंबर वन पर पहुंचे। राज्य की लक्ष्मी यहां-वहां चीत्कार करती रही। आप स्वयं को किसान पुत्र बताकर गौरवान्वित होते रहे और राज्य का किसान कहीं सड़ी प्याज तो कहीं गोलियां तक खा गया। आपने नर्मदा की सेवा के नाम पर उसके तटों को हरियाली की चूनर ओढ़ाने की बात कही, किंतु जिन्हें ऐसा करना था, वे इस हरित क्रांति को चूना लगाने में जुटे रहे। नर्मदा की छाती पर चल रही जेसीबी आपके जाने के बाद अभी भी वैसी ही चल रही है जैसी आप छोड़ गए थे। मौका मिला है आपको वास्तव में साबित करने का कि आप नर्मदा पुत्र हैं। ऐसा कमोबेश हर स्तर पर हुआ और इस सब पर अंकुश लगाने में आप पूरी तरह नाकाम रहे। शिवराज जी, आखिरी के पांच साल में आपने जनमत की नहंी सुनी। आपने आंखों देखी मक्खियां निगली और नतीजे में आप किनारे पर आकर सत्ता से बेदखल हो गये। इसलिए ताकीद कर रहा हूं कि यह गलतियां न दोहराएं। नयी पारी की शुरूआत के लिए यह भ्रम न पालें कि पार्टी को आपका विकल्प नहीं मिल सका। आप इस अपने दल और उसके मुख्य संगठन की नस-नस जानते हैं। इसलिए कोई मुगालता आपको नहीं होगा। दरअसल, हुआ केवल यह है कि जिन 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, वहां आपका चेहरा आज भी कारगर साबित हो सकता है। जिनकी सरकार आपके कहे अनुसार अपने ही बोझ से गिरी उन कमलनाथ ने इस सवा में जनता में खुद यह माहौल बना दिया कि इससे तो अच्छा शिव राज ही था। हुआ यह भी है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के आने के बाद भाजपा इसलिए नरेंद्र सिंह तोमर को आगे नहीं ला सकती, क्योंकि उस पर ग्वालियर-चंबल संभाग के मुकाबले शेष प्रदेश की उपेक्षा करने का आरोप लग जाएगा। वीडी शर्मा भी तो वहीं से है और नरोत्तम मिश्रा भी। गणित आपके पक्ष में है। राजनीति में मेहनत के साथ किस्मत की महत्वपूर्ण योगदान है। अब किस्मत आपके साथ है। इसलिए कहता हूं कि फिसलन से भरी इस राह पर संभल कर चलिए। गलत सलाहकार और अफसर, दोनों से परहेज करें। ध्यान रखें कि समय यदि मार्च, 2020 की तरह करवट ले सकता है तो फिर वह घूम-फिरकर दिसंबर, 2018 जैसे अतीत को भी दोहराने में पूरी तरह सक्षम है। आपके लक्ष्य बहुत स्पष्ट है, इसलिए स्वर्णिम मध्यप्रदेश और नंबर मध्यप्रदेश के लिए सोच समझकर सहयोगियों का चयन करें। फिर से आपको बहुत सारी शुभकामनाएं।    






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