कभी न्याय का मंदिर कहा जाता था मेरा गांव कचैडा वारसाबाद



हमारे गांव की इस मिट्टी का जिस मिट्टी में चारावाहे का न्याय और न्याय की मिसाल अभी भी मौजूद हैं। हालांकि जब से हमारे गांव की जमीन बेची गई है और उस जमीन पर वेवसिटी बस रही है तब से न्याय का संतुलन गडबडाने लगा है। लोग सच्चाई कहकर अब एक दुसरे को नाराज नहीं करना चाहते हैं। जबकि पहले ऐसा नहीं था। पहले कचैडा के लोगों को खरी - खरी कहने के लिए जाना जाता था।
- आकाश नागर 

गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर सीमा पर बसा है मेरा प्रिय गांव कचैड़ा वारसाबाद। बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे गांव का नाम कचैड़ा क्यों रखा गया ? किवदंति है कि सैकड़ों साल पहले हमारे गांव में एक चारवाहा गाय - भैंस चराता था। हमारे गांव के एक तरफ ऊंचा टीला था जो आज भी है लेकिन अब वह गांव में लगभग बीच में तालाब के पास स्थित है जिसे स्थानीय भाषा में  कूड़ ( ऊँचा स्थान ) कहतें है। वह चारवाहा जब उस टीले पर बैठ जाता तो अचानक उसमें परिवर्तन आने लगते थे। वह अनपढ़ चारवाहा उस टीले पर बैठते ही ज्ञान की बातें करने लगता और विद्वानों को भी मात देने लगता । शायद चारों वेदों में से कोई सा वेद ऐसा नहीं था जिसके वह श्लोक और उपदेश लोगों को उस टीले पर बैठकर नहीं सुनाता। 


इसी दौरान गांव में 1 दिन झगड़ा हो गया और झगड़े करने वाले दोनों पक्ष चारवाहा के पास पहुंच गए। चरवाहा टीले पर बैठा और अपना जजमेंट ( फैसला ) देने लगा । बताते हैं कि चारवाहा का वह जजमेंट एक मिसाल बन गया । इसके बाद हमारे गांव सहित आसपास के गांव के लोग उस चरवाहे के पास आने लगे और बकायदा प्रतिदिन टीले पर उसकी कचहरी लगने लगी । जब वह चारवाहा टीले पर बैठता और कचहरी लगती तो निष्पक्ष न्याय देता । गांव बुजुर्ग बताते हैं कि वह चारवाहा न्याय की मूर्ति बन चुका था और लोग उसे जीता जागता न्याय का देवता यानी जज कहने लगे थे । इसी के साथ ही बाहर के लोग अपने झगड़े और आपसी विवाद को निपटाने के लिए चारवाहे के पास आने लगे और न्याय पाने लगे । इसके चलते ही हमारे गांव का नाम कचहरी पड गया। जो बाद में  अपभ्रंश होकर कचैडा वारसाबाद के नाम से जाना जाने लगा ।

 यह शायद गांव में स्थित टीला और उस चारवाहे का ही कोई आशीर्वाद है कि गांव के ज्यादातर मामले कोर्ट कचहरी में जाने की वजह गांव की पंचायतों में ही आपसी सुलह करके खत्म कर दिए जाते हैं । हमारे गांव में किसी भी शख्स को आज तक सजा नहीं हुई है । शायद यह विधि का ही विधान है या हमारे गांव की इस मिट्टी का जिस मिट्टी में चारावाहे का न्याय और न्याय की मिसाल अभी भी मौजूद हैं। हालांकि जब से हमारे गांव की जमीन बेची गई है और उस जमीन पर वेवसिटी बस रही है तब से न्याय का संतुलन गडबडाने लगा है। लोग सच्चाई कहकर अब एक दुसरे को नाराज नहीं करना चाहते हैं। जबकि पहले ऐसा नहीं था। पहले कचैडा के लोगों को खरी - खरी कहने के लिए जाना जाता था।




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