ख़नक पाज़ेब की



अरे पैर खाली क्यों हैं तुम्हारे ? तुम्हारे पैरों पर सूनापन अच्छा नहीं लगता।तुम्हारी पायल की खनक से तो हम समझ जाते हैं कि तुम हो?





सुरेखा अग्रवाल  


अरे यह मॉडर्न ज़माने की बहुएँ भी न।
मेरी बहु कहती 'माजी वह फंस जाती है न।'
अरे नही आंटीजी वह आपरेशन के दौरान उतार दी गई थी।mrs lal को उर्मि ने समझाकर उतर दिया।
बोली लाओ मैं पहना देती हूँ।
उनका स्नेह देख आँखे झलक आई थी।और दूर खड़े तुम मुस्कुरा उठे थे मानो तुम्हारी मनचाही मुराद पूरी हो गई हो जैसे।
पिछली सर्दियों की बात थी। कुनकुनी धूप में रुद्र का cll आया था। एक काम करो न? "हम्मममम्म कहो न..!''
धूप में अपने पैरों की फ़ोटो खींच भेज दो न।
बड़ा अज़ीब सा निवेदन था। खैर मोज़े उतार झट से क्लिक भेज दी थी जानती थी रुद्र कुछ भी बेवजह नही कहता था। उसके पीछे एक तर्क होता था या फिर कोई खुराफ़ात। अरे सिंपल सी पायल क्यों? छोटे छोटे नग हो तो वाह। तुम्हारी शरारत ओर हहहह एक वही चिर परिचित हँसी का प्यारा अंदाज़।
तुम्हारा मेरा रिश्ता आज तक नही समझी पाई मैं। मन के भीतर एक मुनि लिए बैठे थे तुम। औऱ मैं दायरे मे बंधी तुम्हारी मुरीद।
औऱ काग़ज़ी दुल्हन सी उस कठपुतली सी तुम्हारे इर्द गिर्द।
दुनियाँ की भीड़ से परे।
शाम को ही एक पाजेब ले कर आई थी। वह आज तक महफ़ूज़ है मेरे पैरों में।
उस अनजान राह की साथी जिसका तुम्हे भी पता नही था
बस तुम्हारे कदम औऱ मेरी पाजेब की छनक।

दिल दिमाग की गवाही मंजूर नही तुम्हें। उनकी आवाज़ सुनाई नही देती।पर कभी तो लगा होगा या महसूस किया होगा तुमने अपनी व्यस्तता से फुर्सत के बाद।जब तुम मेरी भावनाओ से बेख़बर सिरहाने को पकड़ शांत एकाँत में नितांत अकेले होते होंगे जब..उस छम छम की मद्धम अवाज़ को जो तुम्हारे साथ निरंतर चलने पर भी नही थकती थी।तुम्हारी निंद में ख़लल न हो इसलिए वह तुम्हारे इर्द गिर्द पूरी रात चलती थी।सोती नही थी इस डर से की तुम एक फकीर मल्लङ्ग न जाने कब किधर चल दो।
औऱ वही एक दिन थक कर चूर वह पाज़ेब की ख़नक धीमी पड़ गई। तुम चलते बने।छन छन छन बेतहाशा दौड़ते पहुँची थी। एकाध घुँघरू बिखर गए थे। और पाजेब की चंचलता धीमी हो गई थी। तुम बहुत दूर निकल गए थे। जहां से उठे फिर उसी तरफ़।औऱ पाज़ेब सतत पीछे रफ़्तार मुरझा गई थी। लम्बी दूरी बाकी थी। तुम तक पहुँचती तब तक तुम भिड़ का हिस्सा बन गए थे।उस कोलाहल में मेरी आवाज़ तुम तक नही पहुँच सकी।
आज भी मैं अपने रिक्त स्थान को देखती हूँ। तो भीड़ में नजर नही आता।
पता है आज भी पाज़ेब इंतज़ार करती हैं कि कब तुम्हारे आसपास की भीड़ कम हो तो मैं अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा सकूँ ओर तुम देख सको उस भीड़ में बिखर चुके एकाध घुँघरू।। नग औऱ छम छम के बीच आज भी मैं अपनी अवाज़ का अस्तित्व तुम्हारी भीड़ में ढूढ़ रही हूँ। क्या वाकई तुम्हे कभी महसूस नहीं हुई वह ख़नक पाज़ेब की जब तुम एकांत में होते हो।
झूठे तुम ..बेवज़ह कहते ही कह दो कि हां मैं महसूस करता हूँ तुम्हें..

हज़ारों ऐसे फासले थे
जो तय हम कर चले थे
राहें मगर चल पड़ी थी
औऱ पीछे हम रह गए थे
कदम दो चार चल पाए..




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