भटकन भी अज़ीब होती है चाहतों के पीछे बेवज़ह भागती सी


मन का सवाल    

भटकन भी अज़ीब होती है चाहतों के पीछे बेवज़ह भागती सी।उस   प्रेम में पड़े युगल भाँति।भटकन की मृगतृष्णा तब बढ़ जाती है जब एक विचित्र प्यास बढ़ने लगती हैं। एक लक्ष्य जब पूर्ण नही होता तो बैचैन हो जाती हैं। प्यासी इतनी की हर गीली सतह पर वह नज़र आने लगती है। नतीजा फ़िसलन, काई का जमाव। फिर एक गन्ध औऱ फिर संक्रमण।
- सुरेखा अग्रवाल

अब यही भटकाव जब संक्रमित होता है तब दिक्कतें हद से बाहर हो जाती है। दिल मे अवसाद पनपने लगता है।मिन्नतों की चाह बढ़ जाती हैं। एक तरफ मिन्नते और दूसरी तरफ दम्भ आकार लेने लगता है। मिन्नतों का घुटने टेकना उसे आनंदित कर देता है।अब दम्भ अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझ  मिन्नतों को हेय दृष्टि से देखने लगता हैं।सम्बंधो का पलड़ा या यूँ कहे तराजू डगमगाने  लगता है।पलड़ा अहम का भारी औऱ मिन्नते धराशाई।


यकीन मानिए मिन्नते सशक्त होकर भी हार जाती है। औऱ अहम झूठ होकर जीत जाता है।  उससे ढूंढने की जरूरत नही  पड़ती वह सभी जगह शान से आतिथ्य ग्रहण करता है।

हम आप यह जानते हुए भी उसका विरोध नही करते पता है क्यों वह हम सब मे थोड़ा थोड़ा मौजूद जो होता है। मिन्नते आज भी दम तोड़ देती है। एक गुमशुदा जहां में कैद उम्रकैद की सज़ा। जानती है हमारा अस्तित्व निरीह है।  

कभी वे पेड़ पर लटकी दिख जाती है, तो कभी  प्रेम में ठगी दीवानी  सी पागल।तो कभी एक जोगण सी अपने आराध्य  में विलीन।तो एक पत्नी सी समर्पित तो कभी  शांत उस नदी सी जो अपने आराध्य को जल चढ़ाती घाटों के आस पास। कभी नम आँखो से निहारती हैं उन अरमानों की स्वाहा  होती चिताओं की तरफ़ की उफ़फ़।पर अहम बाज़ नही आता। संवेदना तो देखिए मिन्नतों की एक आस में अब भी जीती है पहरो पलकें गिराए। क्या कीजिएगा जानती है मिन्नते अहम कभी हार नही मानता वह मर जाएगा पर हार को स्वीकृत नही करेगा। विडंबना.!

मुझे मिन्नतों का घुटने टेकना पसन्द नही आता। मैं सहेजने की अंतिम  कोशिश तक दम्भ का साथ देती हूँ। जब देखती हूँ कि उसकी नज़रे आकाश की ओर से नीचे देखना ही नही चाहती। तो मैं चिल्ला कर कहती हूँ  जा हो जा धराशाही मैं अब तुझे नही संभाल सकती।

हँसती हूँ जी खोल उसपर।जानती ही नही यकीन होता है कि लो अब गिरेगा। क्या करे पथरीले रास्ते तो जमीन पर ही है न।

लो गिर गया। आवाज़ सुनी क्या आपने? sssssss sss नही तो रुकिए पहले मैं ख़ुद की हँसी रोक लूँ। निश्चित अब शायद अहम कहीं ओंधे मुँह गिरा नज़र आए? दिखे तो  location भेज दीजिएगा।😂😂

दूर से देख लूँगी।अहम जैसी तुच्छ चीज को उठाने में मैं वक्त जाया नही करती। मुझे ख़ुशी मिलती है मिन्नतों के साथ होने में उनके धाराशाई हुए वजूद को थाम कर उन्हें हिम्मत दिलाने में ।मैं चली उनके पास #अहम या तो मरेगा या वही दफ़न हो जाएगा।खड़ा नही होगा यह मेरी गारन्टी मिन्नते के घुटने टेकने पर ख़ुश होने वाला अहम अपने ही पैरों  के बूते ओंधे मुँह गिर ही जाता है यह उसको पता ही नही चल पाता ,😏😏अंधा कही का ..!!




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