तूफानी फैसलों के बावजूद भाजपा का गिरता जनाधार




एक ओर जहाँ नागरिकता संशोधन बिल को लेकर पूरे देश में गहमागहमी का माहौल बना हुआ है, संसद से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। साथ ही राजनीतिक दल भी इसमें अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है। वहीं दूसरी और भारतीय जनता पार्टी है जो एक के बाद एक तूफानी फैसले लेने में लगी हुई है। किंतु इन्हीं तूफानी फैसलों के बीच प्रश्न यह भी उठता है कि इन तूफानी फैसलों का आखिर जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? क्या मोदी सरकार द्वारा लिए गए यह फैसले सरकार और भाजपा को सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं ? 



भवानी प्रताप सिंह ठाकुर

झारखंड विधानसभा चुनाव में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने 1 साल के भीतर पांचवे राज्य की विधानसभा में सत्ता गवा दी है। 2019 से अपने दूसरे कार्यकाल में एक के बाद एक कई बड़े फैसले तूफानी अंदाज में लेने के बावजूद भी यह भाजपा की दूसरी और बड़ी हार है। भाजपा इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव के पहले भी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में हार का सामना कर चुकी है। मध्यप्रदेश और राजस्थान की हार तो बहुत भारी अंतर से नहीं हुई, किंतु छत्तीसगढ़ में तो भाजपा को एक-तरफा हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि 2019 में संपन्न हुए आम चुनाव में एक प्रचंड और लगभग 50% वोट शेयर के साथ वापसी करने वाली भारतीय जनता पार्टी का राज्यों की विधानसभाओं में गिरता हुआ जनाधार किस ओर इशारा कर रहा है। 


अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने शुरुआत से ही जिस तरह एक के बाद एक बड़े फैसले लेना प्रारंभ कर दिया है। यह मनसा तो भाजपा ने पहले ही स्पष्ट कर दी थी। किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस नए कार्यकाल में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद तो मानो भाजपा के कार्य करने की गति दिन दुगुनी और रात चौगुनी बढ़ने लगी। एक के बाद एक तूफानी फैसले लिए जाने लगे और धारा-370, तीन तलाक जैसे बड़े फैसले मोदी सरकार ने अपने शुरुआती दिनों में ही ले लिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर पर निर्णायक फैसला भी भाजपा के दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ में ही आ गया और अब नागरिकता संशोधन बिल भी संसद के दोनों सदनों से पास हो गया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद एक कानून भी बन गया है। धारा-370 का हटाए जाना और राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आना यह वो दो बड़े फैसले थे जिनके बारे में यह माना जा रहा था कि इनका लाभ सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इन तूफानी फैसलों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव हार गई और हरियाणा में भी उसका  प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है। 

पिछले 1 साल में भाजपा 5 राज्यों में सत्ता गंवा चुकी है। जिनमें से महाराष्ट्र तो अभी हाल ही की बात है। जहाँ 2014 के विधानसभा चुनाव में 122 सीटें जीतने वाली भाजपा, 2019 के विधानसभा चुनाव में 105 सीटें ही जीत पाई। भाजपा सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी जरुर, लेकिन सरकार महज 80 घंटे की ही बना सकी, और इस 80 घंटे की सरकार में भी भाजपा स्वयं को विवादों से नहीं बचा पाई। हरियाणा में किसी तरह जोड़-तोड़ कर सरकार तो बन गई किंतु यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि वहाँ सरकार बनाने के लिए भाजपा को कितनी मेहनत करनी पड़ी है। महाराष्ट्र और हरियाणा में तो भारतीय जनता पार्टी स्वयं को सबसे बड़ा राजनीतिक दल बता कर संतोष कर रही थी किंतु झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनने में भी असफल रही और JMM, भारतीय जनता पार्टी से अधिक सीटें जीतने में सफल रही। 


एक तरफ विधानसभा चुनाव में भाजपा की लगातर हार और सत्ता से बेदखल होती तस्वीर है तो दूसरी ओर भाजपा के वे बड़े नेता और कई कई बार तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। जो राजनीतिक मंचों से अक्सर इस बात का दम भरा करते हैं कि देश की जनता उनके साथ भी है, और और उनके द्वारा लिए फैसलों  से सहमत भी। किंतु यदि सब कुछ ठीक चल रहा था और देश की जनता प्रधानमंत्री मोदी जी के किए गए कार्यों में उनके साथ थी तो अचानक ऐसा क्या क्या हुआ कि वह भारतीय जनता पार्टी जो दिसंबर 2017 तक देश के 29 में से 21 राज्यों की सत्ता पर कबिज़ थी, दिसंबर 2019 आते-आते घटकर 15 राज्यों पर आ गई। 

एक अन्य तरह से देखें तो वह भारतीय जनता पार्टी जो दिसंबर 2017 तक देश के 71% भू-भाग की 68% आबादी वाले क्षेत्र पर राज कर रही थी। दिसंबर 2019 आते-आते 71% से सिमट कर देश के 35% भू-भाग और 43 % आबादी पर आ गई।


एक दौर वह था जब भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के साथ अपने विस्तार में लगी थी किंतु पिछले कुछ दिनों में ही वह विस्तार थम सा गया है। दूसरी पार्टियों के विधायक तोड़कर स्वयं की पार्टी में जोड़ लेने वाली भाजपा विचार इस बात पर भी कर रही होगी कि आखिर क्या वजह है कि उसी की पार्टी के कई आला नेता पार्टी को छोड़ या तो विरोधी पार्टी में शामिल रहे हैं या फिर निर्दलीय चुनाव लड़कर खुद भाजपा के लिए ही चुनौती पेश कर रहे हैं। 

संभवत एक लड़ाई  'हम'  और  'अहम'  के बीच में भी छिड़ी हुई है। वह भारतीय जनता पार्टी जो 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले क्षेत्रीय और सहयोगी दलों को अपने साथ लिए 'हम' कहती हुई आगे बढ़ रही थी। वह 2019 के आम चुनाव जीतने के बाद महाराष्ट्र में अपने सबसे पुराने साथी शिवसेना के साथ गठबंधन तोड़ देती है और झारखंड में अपनी सत्ता में सहभागी रही आजसू का। अनुमान यह भी लगाए जा रहे हैं कि भाजपा अब सहयोगी दलों और गठबंधन में साझा सरकार बनाने से अधिक ध्यान  राज्यों में स्वयं को मजबूत करने पर दे रही है। इसीलिए तो वह ना तो महाराष्ट्र में शिवसेना के सामने झुकी और ना ही उसने झारखंड में किसी क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन करना उचित समझा। किंतु विधानसभा चुनाव में मिल रही हार को देखकर प्रश्न यह उठता है कि क्या वह ऐसा कर पा रही है।

महाराष्ट्र, हरियाणा और  झारखंड  के चुनाव बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह लिए भी काफी अहम था। माना जा रहा था कि बतौर पार्टी अध्‍यक्ष यह उनका आखिरी चुनाव होगा।

लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा की एकतरफा जीत का एक कारण प्रधानमंत्री मोदी की छवि मानी जा रही थी तो वही दूसरा कारण भाजपा के चाणक्य अमित शाह की नीतियां।  लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 की जबरदस्‍त सफलता के बाद पार्टी एक के बाद एक विधनसभा चुनाव हार गई। 

अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार का सीधा असर भाजपा के राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के इरादे पर पड़ रहा है। अप्रैल 2020 में राज्यसभा की 69 सीटें खाली होना हैं। वर्तमान समय में भाजपा के पास 83 सीटें हैं। जिन 69 सीटों पर चुनाव हो रहा है, उसमें से इन 5 राज्यों की कुल 19 सीटें हैं। इन पांच राज्यों से भाजपा के पास 7, कांग्रेस के पास 4, एनसीपी के पास 2, शिवसेना के पास 1, आरपीआई- आठवले के पास 1, आरजेडी के पास 1, दो निर्दलीय और एक नामांकित है। इन राज्यों में विधानसभा के गणित के हिसाब से महाराष्ट्र में भाजपा को एक सीट का फायदा हो रहा है। हरियाणा में कांग्रेस की एक सीट खाली हो रही है, भाजपा आसानी से यहां नंबर बढ़ा सकती है। छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के पास 1-1 सीट है। यहां भाजपा को मात मिल सकती है। मप्र में एक सीट के लिए 77 वोट चाहिए, जबकि भाजपा के पास 109 है। ऐसे में भाजपा को दो में से एक सीट गंवानी पड़ सकती है। 

भाजपा के चाणक्य अमित शाह के  गृह मंत्री बनने के बाद एक ओर जहां भाजपा संगठन दिन पर दिन कमजोर होता नजर आ रहा है। वहीं दूसरी और बतौर गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लिए गए फैसले भी भाजपा के पक्ष में गिरते नजर क़नहीं आ रहे। बतौर गृहमंत्री अमित शाह ने देश की संसद में यह स्पष्ट कर दिया है की वह सीएबी को तो लागू करेंगे ही, साथ ही आने वाले समय में एनआरसी भी पूरे देश में होगा। 

फिलहाल बीजेपी एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल को लेकर झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ रही है देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में जब दिल्ली बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्य में चुनाव होता है तो बीजेपी का यह दांव आखिर कितना और क्या प्रभाव डालता है। क्या मोदी सरकार द्वारा लिए जा रहे हैं यह तूफानी फैसले जनता को पसंद आते हैं या फिर जनता मोदी सरकार को नकार देती है ? वैसे झारखंड और महाराष्ट्र में मिली हार ने भाजपा को यह नसीहत दे ही दी होगी कि अब दौर परिवर्तित हो चुका है और अब जनता राज्य के चुनावों में स्थानीय मुद्दों के आधार पर वोट कर रही है ना कि राष्ट्रीय विषयों पर, साथ ही भाजपा को चिंतन इस बात पर भी करना होगा कि अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं और सहयोगी दलों को किनारे करके चुनाव लड़ने की नीति आखिर कितनी कारगर है। 

महाराष्ट्र हरियाणा और झारखंड में भाजपा के दिग्गज और सेलिब्रिटी प्रत्याशियों की हार इस बात का भी संकेत है कि अब देश की जनता नाम पर नहीं बल्कि काम पर वोट दे रही है। झारखंड चुनाव के परिणाम आने से पहले ही भाजपा दिल्ली के रण में अपना चुनावी शंखनाद कर चुकी है देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा दिल्ली में आम आदमी पार्टी और सीएम अरविंद केजरीवाल के खिलाफ किन नीतियों को अपनाती है। क्या दिल्ली के चुनाव में स्थानीय मुद्दों को जगह मिलेगी ? या फिर एक बार फिर से दिल्ली के चुनाव भी एनसीआर, नागरिकता संशोधन और अन्य राष्ट्रीय मुद्दों के बीच दिल्ली के स्थानीय मुद्दे कहीं दब कर रह जाएंगे। झारखंड की हार के बाद दिल्ली का चुनाव भाजपा और अमित शाह के लिए के लिए अब पूरी तरह साख की लड़ाई बन चुका है और इसे जीतने के लिए भाजपा हर संभव प्रयास करेगी। देखना दिलचस्प होगा कि क्या दिल्ली की जनता भारतीय जनता पार्टी को मौका देगी ? या सीएम अरविंद केजरीवाल द्वारा किए गए कार्य मोदी जी की छवि और नीतियों पर भारी पड़ जाएंगे।





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