कला: कहने की सुनने की




क्या हम कहने और सुनने में माहिर हैं? जीवन के उन लम्हों को याद करने की कोशिश कीजिए जब हम बोल नहीं सकते थे।  हम केवल सुन सकते थे और सुनने की प्रक्रिया उस वक्त तक चली जिस वक्त तक हम बोलना नहीं सीखे। जब से हमें बोलना आया तब से सुनने की इच्छा, सुनने का धैर्य, हम गंवा चुके है। कहने से पहले हमने सुनना सीखा लेकिन आज तक हम ढंग से सुनना सीखे है क्या? नहीं सीख पाये..यही कटु सत्य है। अगर हम सही में सुनना सीख गए होते तो बोलना सीखने की जरूरत नहीं पड़ती।







भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात


दुनिया में तरह तरह के लोग पाये जाते है। कुछ लोग है जो मितभाषी है। बहुत कम बोलते है तो कुछ ऐसे कि इतना बोलते है कि 'हे.. भगवान..इस को तनिक विश्राम लेना भी सिखाओ' कहने का मन हो जाता है।


सुनना भी एक कला है
ज्यादातर हम कैसे सुनते है? अपनी सीमित सोच के साथ ,अपनी सीमित बुद्धि के साथ, अपने सीमित दायरे के साथ। इनसे क्या होता है? जब भी हम कुछ सुनते है मानसिक तौर पर उसका विश्लेषण शुरू हो जाता है। उन शब्दों को हम अपनी सीमित विचारधारा से जाँचने, परखने लगते है। उसको अपनी छोटी सी बुद्धि से नापने लगते है। हम वही करते है जो आज तक हमारे अनुभवों से हमने सीखकर संगृहीत किया है हमारी बुध्दि की छोटी सी तराजू भी है न हमारे पास ..! तो,उसी तराजू में हम उसे तोलते भी लगते है और आखिरकार हम उसे नकार देते है।

देखिए, सृष्टि में ऐसे कितने तथ्य है जिनको हम नहीं जानते? हम नहीं जानते कि बीज पहले आया कि वृक्ष..! हम नहीं जानते कि अंडा पहले आया या परिंदा..! हम नहीं जानते की संसार में हररोज संहार और सृजन का चक्र चल रहा है उसके पीछे कौन है? हम नहीं जानते कि सुबह घोसलें से उड़ान भरकर दिनभर इधर उधर घूमता परिंदा शाम को ठीक अपने घोसलें में ही वापस क्यूँ आता है..? हम नहीं जानते कि अरबो खरबो मिलो का अंतर काटकर यायावर एक से दूसरे देश क्यूँ जाता है? हजारों जीव, हजारों जंतु..हजारों पंछी, हजारों पशु, हजारों इंसान फिर भी एक दूसरे से भिन्न क्यूँ है.? कुछ भी तो नहीं जानते हम..! और फिर भी हम बहुत ही बुद्धिमान होने का दावा करते हुए उन तथ्यों को खारिज करते है जो सच है या फिर सच होने की सम्पूर्ण संभावना के साथ खड़ा है। हम तो बस वही सुनना चाहते है जो हम जानतें है?

अगर मैं कुछ ऐसा कहूँ कि जो आपने पहले कभी सुना न हो तो आप क्या करेंगे? मुझे झूठा साबित करने के लिए हजारों दलीलें करेंगें। सही है न? मगर संसार अनगिनत संभावनाओं से भरा है एक बार इस सत्य को श्रद्धा पूर्वक स्वीकार लेंगे तो अनगिनत शक्यता के द्वार आप को भी नजर आएंगे..


सुनने की आदतें
आजकल हम चोरी छिपे बातें सुनने की आदी हो गये हैं जिससे हमारा मन ही गंदा होता है। हमारा मन कुंठा से भर जाता है। संकुचित हो जाता है इनसे क्या होगा? हमारा मन सिर्फ उसी में उलझ जाता है और हमारे आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति खत्म होकर हमारी शतप्रतिशत शक्तियां केवल उसी में खर्च होने लगती है। ठीक उसी तरह ही है निंदा, कुथली, या फिर गॉसिप..! हम क्या करते है हमारी सम्पूर्ण ताकत इस तरह के फिजूल कार्यों में लगा देते है। आपने खुद का अवलोकन किया है कभी? जब भी आप किसी की निंदा करते है या सुनते है आप खुद थका हुआ महसूस करते है। अपनी शक्ति गंवाकर शिथिल हो जाते है।

हम तो गाँधीजी के तीन बंदरों से भी कुछ नहीं सीख पाये। जब कि बंदरों का वो संदेश आज भी कितना सारगर्भित है..!

सुनने की कुछ गलत आदतें और हमारें सामाजिक संबंध
आज कल इंसानों का इंसानों से विश्वास उठ गया है। सत्य को साबित करने के लिए तरह तरह की तरकीब अख्तियार की जाती है और उसी में मददगार हो रही है आज की टेक्नोलॉजी।

आजकल मोबाइल पर रिकार्डिंग करके उसे सुनने-सुनाने का व्यापार बढ़ रहा है जो महज एक बहुत बुरी आदत है। क्यूँकि वार्तालाप की जो लोग रिकार्डिंग रखने के आदी होते हैं वो आपको दुखी ही दिखेंगे। कलह का बीज है ये वाक्य " तुझे रिकार्डिंग सुनवाऊँ कि तूने उससे क्या कहा था" या फिर मुझे क्या कहा था?"

इनसे क्या होगा?  आप जंग जीत भी जाओ मगर संबंधों की जंग आप हार ही जाओगे। मित्रों के बीच, हमारें करीबी रिश्तेदारों के बीच आप को अपनापन महसूस ही नहीं होगा कदाचित वह लोग आप को दरकिनार भी कर देँगे। क्या पाओगे? अकेलापन? क्या यही पाने के लिए सुनना सीखा? इनसे अच्छा तो यह होता की हम बहरे ही होते..!

ईश्वर ने कान की रचना ऐसे की है की वो चौबिसों घंटे खुले ही रहते है कोई ढक्कन बक्कन नहीं है..! वरना हमें स्वतंत्रता होती कि जो सुनना हो वो सुने अन्यथा कान को ढक्कन लगाकर बैठ जाए..! मगर दो कानों की बीच एक दिमाग भी दिया है ईश्वर ने। जो स्वतंत्र है, सोच सकता है। वो तो तय कर ही सकता है कि उसे क्या सुनना है और क्या नहीं..! या फिर जो सुना है उसमें से क्या संभालकर रखना है और क्या विस्मृत करना है। आपने सोचा कभी कि आजतक हमने कितना सुना है..? अनगिनत वार्तालाप, अरबो खरबों शब्द..इन में से कितना याद रख पाये..? बहुत ही कम जो जरूरी न था वो कुदरती तरीके से डिलीट होता ही रहता है। प्रिंट-डिलीट का यह चक्र निरंतर चलता है। कल्पना करें कि अगर विस्मृति न होती तो? डिलीट बटन न होता तो? हमारी रेम कब की  भर गई होती और हमारे विचारों का वह ब्लास्ट शायद सुपरनोवा धमाके से कम न होता..! शुक्र है ईश्वर का कि उनकी रचना में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी।

हाँ कमी जो है वह हमारी ओर से है। हम वही सुनना चाहते है जो हमें अच्छा लगे। अगर हम संगीत प्रेमी है तो हम संगीत के साथ जुड़ेंगें , साहित्य प्रेमी है तो हम साहित्यकारों के साथ जुड़ेंगें और अगर गॉसिप प्रेमी है तो...
चुनाव हमारा है कि हमें क्या सुनना है। विद्वज्जनों ने हमें बहुत कुछ कहा है बहुत समझाया है कि हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा..! मगर उनको भी सुनेगा कौन..?

कहना भी एक कला है
हम कोई बहुत अच्छी बात सुनते हैं तो तुरंत उसका वितरण करना शुरु कर देते हैं। वितरण अगर करना ही हो तो अच्छी बातों का ही करें वो सुनने वाले की और हमारी सेहत के लिए अच्छा है और हमारे अंदर एक डस्टबिन भी रखना चाहिए जहाँ हम बुरी बातों को डालकर खाली हो सके।

कहने वाले की शब्दावली से पहचान हो जाती है उसके सुनने की क्या आदत है। उसने जो सही सुना है तो सही ही कहेगा। उसने जो भी सुना है मगर बीच में अपनी सोच का फिल्टर लगाकर सुना होगा तो निसंदेह वह स्वच्छता ही बहायेगा भले ही उसने गालियां भी सुनी हो..!

कहने का काम करती जिह्वा भी तो बत्तीस दांतो के बीच रहती है जानती है की कैसे रहना है पलभर भी सजगता गंवाना उनके लिए अच्छा नहीं होगा। यह जानते हुए भी जब वह गंदी सोच के हाथों में अपनी लग़ाम दे देती है तब कहीं तो विनाश अवश्यम्भावी है..!

हमारा दायित्व
कहना एक कला इसी लिए है कि कहने के लिए जो माध्यम बनता है वह शब्द अपनेपन के एहसास से भिगोकर बाहर आने चाहिए। शब्द की धार कुंठित न हो मगर इतनी भी तेज न हो की सुनने वालों को रूह तक चीर दें। शब्द को होमियोपैथी गोलियों की तरह देने चाहिए स्युगर कोटेड..ताकि अपना काम भी करें और लेनेवाले को कड़वा भी न लगें।

कभी कभी समाज में, परिवार में, हमारी जिम्मेदारी भी रहती है की हम जो गलत रास्ते पर जा रहे है उन को सही रास्ते पर ले आये। मगर कैसे? बहुत ही अपनेपन से क्योंकि अपनापन ही हर मर्ज की दवा है। हर समस्या का समाधान भी..

खुद के जीवन को भी देखें हम कितना जियेंगे अब..! कुछ कह नहीं सकते। कितना तो जीवन हम गंवा चुके है बाकी जो शेष है उसे हम कैसे व्यतीत करना चाहेंगें ? सोचिए। ठीक वैसे ही कि जैसे हम जीते आ रहे है या फिर उनमें कुछ नयापन मिलाकर..!

बहुत कम सांसें बची है तो क्यूँ न हम इसे अन्यों की चेतना को ऊपर उठाने के लिए खर्च कर दें।
सुनना केवल कानों से नहीं होता आँखों से भी तो होता है। इन कागज पर पड़े शब्द आप आँखों से ही तो सुनते है। ठीक वैसे ही बोलना भी कलम के ज़रिए होता है। तो क्यूँ न हम आज इस वक्त से प्रण ले की हमारे शब्द दूसरों के उत्थान के लिए हो। दूसरों की कमजोर हुई क्रियाशक्ति को पुनः कार्यान्वित करने में काम आये। हम खुद भी गतिमान रहे और दूसरों को भी गति दें।

साहित्य का धर्म यही है और साहित्यकार का कर्म भी यही..!

शुभमस्तु





Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

3 comments:

  1. धन्यवाद आदरणीय संपादक श्री.मुकुट सक्सेना जी।

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुंदर, उपयोगी एवं अनूठी जानकारी देने वाला लेख... लेखिका और सम्पादक जी को बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद पंकज जी

      Delete

abc abc