बहुत धन-दौलत, यश भी दुःख का कारण, इसलिए मर जाते हैं करोड़पति भी



निश्चित ही बेपनाह धन सुखी होने की गारंटी नहीं. बहुत धन-दौलत, यश भी दुःख का कारण बन गया है. बेपनाह धन होने के बाद भी धनपति तनाव नहीं झेल पा रहे और ख़ुदकुशी कर रहे हैं. कैसे बचा जाए इस बड़ी समस्या से? 



डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

दाम बिना निर्धन दु:खी, तृष्णा वश धनवान,
कहीं न सुख संसार में सब जग देखो छान.
बेपनाह धन होने के बाद भी धनपति तनाव नहीं झेल पा रहे और ख़ुदकुशी करते हैं. इस विषय पर जब इतिहास पढ़ा तो समझ में आया कि यह धन जिसे दौलत भी कहते हैं ,जब आती है तो वह छाती पर एक लात मारती है तो आदमी अकड़ कर चलता है और जब जाती है तो वह पीछे कमर पर लात मारती है तो आदमी झुक कर चलता है. इसीलिए दौलत तो एक प्रकार से आने जाने वाली हैं. ये सब वस्तुएं मनुष्य को अपने अपने पुण्य पाप से आती या मिलती हैं. ये सब सुख क्षणिक होते हैं और ये पराश्रित हैं यानी दूसरों पर आश्रित होने से दुःख का कारण हैं.


जब मनुष्य सफलता प्राप्त कर लेता है तो उसका श्रेय अपने आपको देता है और जब कोई काम बिगड़ता है तो वह अपने भाग्य पर दोष डालता है.
दुःख में सुमरन सब करे, सुख में करें न कोय ,
जो सुख में सुमरन करे तो दुःख काहें को होय 
जब पुण्य के उदय से सब सुख सामग्री मिलती हैं तो वह अभिमान से परिपूर्ण होकर अहंवादी हो जाता हैं ,इस समय वह इतना अहंवादी होता है कि वह अपने परिवार, मित्र जन से भी दूर होने लगता है, उसे अपने प्रत्येक क्षण का मूल्य मालूम होता है, वह मूल्यवान हो जाता है. इसी समय वह यदि अपना आत्मनिरीक्षण करे और समझे की यह धन क्षणिक है और आज तक कोई भी इस धन को लेकर अन्य लोक में नहीं ले जा सका. वह धन अपने साथ न लाया था और न साथ ले जायेगा, उस समय कुछ धन को परोपकार में लगाए, और धन की एक सीमा होनी चाहिए. 


आज कोई भी कंपनी लिमिटेड /सीमित /मर्यादित क्यों रखती है. अमर्यादित क्यों नहीं रखती है. हम कार लिमिट में क्यों चलाते हैं, अनलिमिटेड क्यों नहीं? हम भोजन सीमित मात्रा में क्यों खाते हैं, असीमित क्यों नहीं? इसी प्रकार हम धन का संचय जो परिग्रह रुपी पाप के अंतर्गत आता है, को सीमित क्यों नहीं कर सकते हैं. आज जिनके पास असीमित धन हैं उनको सरकार के सामने अपना हिसाब किताब देना होता है और इस पाप के कारण दण्डित भी होना पड़ता है. इसी दंड के भय से उन्हें आत्महत्या करना पड़ती है या वे विक्षिप्त होकर कुछ भी अनर्गल कृत्य करते हैं.

धन यश कमाना गलत नहीं है, पर असीमित होने के कारण दुखी होते हैं. आज वर्तमान में चाहे चिदमबर हो या नीरव मोदी चौकसी, माल्या या अन्य कोई भी सब दुखी हैं और भागे भागे फिर रहे हैं और जेल में हैं. 

वर्षा के जल से कभी भी नदियों में बाढ़ नहीं आती, जब तक कि उसमें नाले, नालियों का पानी न मिले. अन्याय से धन कमाने की अपेक्षा गरीब रहना अच्छा है, जिस प्रकार कोई दुबला मनुष्य मोटा होने के लिए शरीर में सूजन आ जाए उससे वह दुबला अच्छा. अन्याय का धन दस वर्ष तक फलता फूलता है और 11 वे वर्ष वह मूल के साथ चला जाता है. परिग्रह परिमित धरम का पालन होने से हम बहुत सीमा तक पापों से और दुखों से मुक्त हो सकते हैं.

इस जमीन पर कितने कितने चक्रवर्ती, राजा महाराजा आये और चले गए पर क्या कोई अपने साथ कुछ भी ले जा सका. फिर यह अंतहीन दौड़ क्यों?
अपने जीवन में "और" की जगह "बस" को अपनाओ यही है सुखी होने का मंत्र.




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