तुम्हारा स्पर्श ही




सुनो
किसी भी रिश्तों में उलझो मत
हर रिश्ता परिपूर्ण होकर भी अपनेआप में अधूरा सा
रिश्ते को गहराई से देखो, परखों और
उसमें घुलकर भी अलिप्त रहो

यह प्रकृति को देखो
इन में सब कुछ चलायमान मगर फिर भी है
वह स्वयम में स्थित
न किसीसे लगाव न किसीसे अलगाव
न कोई असमंजस न कोई तनाव
जब वह स्वयम स्पष्ट है तो उलझन कैसी?

तुम भी तो वही हो
जो उसमें है वही तुझ में भी

हर रिश्ता तुमसे होकर गुजरता है
निखरता है और परिपूर्ण भी होता है
पूर्णता का कोई आयाम होता है भला..!

जिसे तुमने चाहा वही पूर्ण
जिसे तुमने देखा वही पूर्ण
जिसे तुमने छुआ वही पूर्ण

तुम्हारा स्पर्श ही हर रिश्ते की संजीवनी है

भावनगर, गुजरात    




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

2 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय

    ReplyDelete
  2. अतिसुन्दर..����

    ReplyDelete

abc abc