हर पहचान से परे है प्रेम




'' प्रेम के पर्याय श्री कृष्णा हर रूप में हमारे अंदर विराजमान हैं. विडम्बना यह है कि हम तलाश करने निकल पड़ते हैं और यही भ्रम हमें भटकाव में डाल देता है. भावनगर गुजरात से सुप्रसिद्ध लेखिका भावना भट्ट जी, जिन्होंने अपने लेखन से एक अलग पहचान बनाई. आपकी बहुत सी कविताएँ हम लोगों को पढ़ने के लिए मिलती हैं, जिनमें संजीदगी स्पष्ट दिखाई देती है. ऐसी ही एक बेहद शानदार प्रस्तुति -

- नीलम दीक्षित


हर पहचान से परे है प्रेम

मैं
बेवजह सोचने लगती हूँ
उसके बारे में जो कभी हुआ ही नहीं
और शायद..! ना कभी होने वाला भी है

तुम कहते हो ज्यादा सोचो मत
भरोसा है न तुम्हें ..? तुम्हारें ईश्वर पर..!

मैं
चुपचाप तुम्हें देखती रहती हूँ
जैसे समय के उस पार दिख रहा हो ..वही कृष्ण .!
यमुना तट पर अपने घुँघराले बालों को लहराते हुए

मधुर मुस्कान भरे ठीक वही लहजे में
तुम कहते हो कि ऐसे देखो मत
मैं हूँ न ..तुम्हारें हृदय में, तुम्हारे अस्तित्व में..!
पहले भी था..और रहूंगा सदा के लिए

मैं
आँखें मूँदकर देखती रहती हूँ खुद को और
सोचती हूँ कि मैं कैसे भूल गई तुम्हें ?
तुम तो थे मेरे आसपास..और मैं बाँवरी
ढूंढती रही तुम्हें..
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघरों में..!

क्यूँ न देख पाई मैं तुम्हें.?
कहीं वही विस्मृति मुझे फिर से न घेर लें कृष्ण..!
अब मुझ में हिम्मत नहीं है तुम्हें गँवाने की
इसी लिए तुम रखो मुझे अपने घेरे में

नाम चाहे जो भी दो..
हर पहचान से परे है... प्रेम
  



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3 comments:

  1. आपकी बहुत ही आभारी हूँ आद मुकुट सक्सेना जी और सुंदर टिप्पणी के लिए आद. नीलम दीक्षित जी का भी दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ।

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  2. आपकी कविताएं बेहतरीन होती है। बधाई।

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    1. धन्यवाद पंकज जी।

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